दर्शनशास्त्र

चार्वाक एक प्रसिद्ध अनीश्वरवादी और नास्तिक विद्वान। बार्हस्पत्य। (चार्वाक दर्शन के रचियता) .उक्त विद्वान द्वारा चलाया हुआ मत या दर्शन जो‘लोकायत’ कहलाता है। चार्वाक दर्शन मूल रूप से भौतिकवाद पर आधारित है।


 
जो ईश्वर को माने वह आस्तिक तथा जो ईश्वर को न माने वह नास्तिक। इसी अर्थ के आधार पर उन्होंने भारत के दर्शन–सम्प्रदायों का भी विभाजन कर रखा है। इनके हिसाब से सांख्य–योग, न्याय–वैशेषिक तथा मीमांसा–वेदान्त तो आस्तिक सम्प्रदाय हैं जबकि जैन–बौद्ध और चार्वाक नास्तिक सम्प्रदाय हैं। इसमें मजेदार बात यह है कि भारत के प्राचीनतम दार्शनिक सम्प्रदाय सांख्य सम्प्रदाय को इन कथित बुद्धिजीवियों ने आस्तिक सम्प्रदायों में शामिल कर रखा है जबकि सांख्य वाले ईश्वर को मानते ही नहीं, इस आधार पर कि उनके सम्पूर्ण सृष्टि–विवेचन में, सांख्य दार्शनिकों के मतानुसार, ईश्वर की कोई भूमिका ही नहीं है।

दरअसल भारत की सम्पूर्ण दार्शनिक परंपरा में ज्ञान का महत्व तो है, जन्म–बंधन–मोक्ष का महत्व तो है, पर ईश्वर का कोई महत्व, या फिर कोई निर्णायक महत्व है ही नहीं, जैसा कि पश्चिम से भारत आई विदेशी विचारधाराओं में है। इसलिए भारत की दर्शन–परंपरा का अध्ययन और विवेचन ईश्वर को केन्द्र में रखकर हो ही नहीं सकता, और हुआ भी नहीं है। ईश्वर का, उसके प्रतिनिधि रूप ब्रह्मा–विष्णु–शिव–शक्ति का और उनके राम, कृष्ण सरीखे दस या चौबीस ही नहीं, बल्कि सभी पूर्णावतारों–अंशावतारों का मामला महाकाव्य–पुराणों का तो है, दर्शन ग्रंथों का नहीं है।

भारत की बौद्धिक परंपरा में सिर्फ चार्वाक को ही नास्तिक दर्शन माना गया है और इसके अलावा शेष सभी दर्शन आस्तिक दर्शन ही हैं। क्यों? इसलिए कि हमारे देश में नास्तिक सिर्फ उसे माना गया है जो पश्चिम की परिभाषा वाले धर्म या ईश्वर का नहीं, बल्कि वेद का निंदक या विरोधी माना गया है – ‘नास्तिको वेदनिन्दक:’, अर्थात जो वेद की निन्दा करे वह नास्तिक है। चार्वाक के अलावा किसी ने भी, सांख्य से लेकर बौद्ध, जैन, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त तथा परवर्ती रामानुजी, रामानन्दी, सिख, उदासी, गोरखपंथी, नाथ, सिद्ध, राधास्वामी, आर्य समाज, आ॓शो तक जितने भी असंख्य विचार सम्प्रदाय हमारे देश में हुए हैं, किसी ने भी वेदों की निंदा नहीं की। इसलिए, आज खुद को भारतीय परंपरा का उत्तराधिकारी मानने वाले विद्वान अगर दर्शन सम्प्रदायों को नास्तिक–आस्तिक के वर्ग में रखते हैं और बौद्ध, जैन आदि को नास्तिक सम्प्रदाय मानने का वैचारिक अपराध करते हैं तो वे यह अपराध आज के महाब्राह्मणों के असर के कारण ही अज्ञानवश कर रहे हैं।

क्यों नहीं की किसी ने वेदों की निंदा? इसलिए नहीं कि वेद कोई धर्मग्रंथ हैं, किसी मसीहा का इलहाम हैं या ईश्वर का या उसके किसी सगे–संबंधी की शुभ सूचनाएं हैं। भारत की बौद्धिक परंपरा इनमें से किसी भी बात को स्वीकार ही नहीं करती। ये बातें इस परंपरा की सोच का हिस्सा हैं ही नहीं। वेद की निंदा किसी ने नहीं की, लेकिन एक चार्वाक ने की और वेदों को धूर्तों, चापलूसों और राक्षसों की बकवास तक कह दिया, इसलिए चार्वाक मुनि रेखांकित हो गए और नास्तिक मान लिए गए। पर उन्हें पूरे भारत में कोई ठोस परंपरा नहीं मिली, बेशक परंपरा ने उन्हें विचारकों की श्रेणी में जगह जरूर दे दी।

वेदों की निंदा किसी ने इसलिए नहीं की क्योंकि वेद ज्ञान का स्रोत हैं, विचारों का अबाध प्रवाह हैं, प्रकृति के विभिन्न प्रत्यक्ष–परोक्ष रूपों को देवता मानकर उन पर लिखे गए मंत्रों का संग्रह हैं, अपने समय के भारतीय समाज का सम्पूर्ण शब्द–आकार है, साहित्यिक प्रतिबिंब हैं और लगातार विमर्श का विषय रहे हैं। ऐसे वेदों की निंदा करने का कोई अवसर था ही नहीं, आज भी नहीं है।

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प्रत्याख्यान

यह एक अव्यवसायिक वेबपत्र है जिसका उद्देश्य केवल सिविल सेवा तथा राज्य लोकसेवा की परीक्षाओं मे दर्शनशास्त्र का विकल्प लेने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है। यदि इस वेबपत्र में प्रकाशित किसी भी सामग्री से आपत्ति हो तो इस ई-मेल पते पर सम्पर्क करें-

mitwa1980@gmail.com

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संपादक- मिथिलेश वामनकर

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