दर्शनशास्त्र

ओमप्रकाश कश्यप 

भारतीय परंपरा में जीवन के चार पुरुषार्थ माने गए है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। ये जीवन का मूल तत्व या पदार्थ भी हैं, जिन्हें प्राप्त कर लेना मानव जीवन की वास्तविक उपलब्धि कही जा सकती है। इनमें से पहले तीन की प्राप्ति इसी जीवन में संभव है, जबकि चौथे के लिए मृत्यु के पार दस्तक देना जरूरी है। इस बारे में आगे चर्चा करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि मोक्ष क्या है। भारतीयपरंपरा में इसका सीधा सीधा मतलब है मुक्ति, यानी संसार के आवागमन से दूर हो जाना। सामान्यत इसका अर्थ उस स्थिति से लिया जाता है जब आत्मा परमात्मा में मिलकर उसका अभिन्न-अटूट हिस्सा बन जाती है। दोनों के बीच का सारा द्वैत विलीन हो जाता है। यह जल में कुंभ और कुंभ में जल की सी स्थिति है। जल घड़े में है, घड़ा जल में। घड़ा यानी पंचमहाभूत से बनी देह। पानी की दो सतहों के बीच फंसी मिटटी की पतली सी क्षणभंगुर दीवार, जिसकी उत्पत्ति भी जल यानी परमतत्त्व के बिना संभव नहीं।

 

वेदांत की भाषा में जो माया है। तो उस पंचमहाभूत से बने घट के मिटते ही उसमें मौजूद सारा जल सागर के जल में समा जाता है। सागर में मिलकर उसी का रूपधारण कर लेता है। यही मोक्ष है जिसका दूसरा अर्थ संपूर्णता भी है, आदमी को जब लगने लगे कि जो भी उसका अभीष्ट था, जिसको वहप्राप्त करना चाहता था, वह उसको प्राप्त हो चुका है। उसकी दृष्टि नीर-क्षीर का भेद करने में प्रवीण हो चुकी है। जिसके फलस्वरूप वह इस संसार की निस्सारता को, उसके मायावी आवरण को जान चुका है। साथ ही वह इस संसार के मूल और उसके पीछे निहित परमसत्ता कोभी पहचानने लगा है। उसे इतना आत्मसात कर चुका है कि उससे विलगाव पूर्णत: असंभव है। अब कोई भी लालच, कोई भी प्रलोभन कोई भी शक्ति अथवा डर उसको अपने निश्चय से डिगा नहीं सकता। इस बोध के साथ ही वह मोक्ष की अवस्था में आ जाता है। तब उसकोजन्म-मरण के चक्र से गुजरना नहीं पड़ता। 

मुक्ति का दूसरा अर्थ है आत्मा की परमात्मा के साथ अटूट संगति। दोनों में ऐसी अंतरगता जिसमें द्वैत असंभव हो जाए। परस्पर इस तरह घुल-मिल जाना कि उनमें विलगाव संभव ही न हो। जब ऐसी मुक्ति प्राप्त हो, तब कहा जाता है कि सांसारिक व्याधियों से दूरमन पूरी तरह निस्पृह निर्लिप्त हो चुका है। जैन दर्शन में इस अवस्था को कैवल्य’ कहा गया है। कैवल्य यानी अपनेपन की समस्तअनुभूतियों का त्यागकर ‘केवल वही’ का बोध रह जाना। यह बोध हो जाना कि मैं भी वहीं हूं और एक दिन उसी का हिस्सा बन जाऊंगा।उस समय न कोई इच्छा होगी न आकांक्षा। न कोई सांसारिक प्रलोभन मुझे विचलित कर पाएगा। इसी स्थिति को बौद्ध दर्शन में ‘निर्वाण’ कीसंज्ञा दी गई है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-‘बुझा हुआ’। व्यक्ति जब इस संसार को जान लेता है, जब वह संसार में रहकर भी संसार से परे रहने की, कीचड़ में कमल जैसी निर्लिप्तता प्राप्त कर लेता है, तब मान लिया जाता है कि वह इस संसार को जीत चुका है।

इच्छा-आकांक्षाओं और भौतिक प्रलोभनों से सम्यक मुक्ति ही निर्वाण है। गीता में इस स्थिति को कर्म, अकर्म और विकर्म के त्रिकोण के द्वारा समझाने का प्रयास किया गया है। उसके अनुसार संसार में सभी व्यक्तियों के लिए कुछ न कुछ कर्म निर्दिष्ट हैं। जब तक यह मानव देहहै, कर्तव्य से सरासर मुक्ति असंभव है। क्योंकि देह सांस लेने का, आंखें देखने का कान, सुनने का काम करती रहती है। संन्यासी को भीइन कर्तव्यों से मुक्ति नहीं। जब तक प्राण देह में हैं, तब तक उसको देह का धर्म निभाना ही पड़ता है। तब मुक्ति का क्या अभिप्राय: है! बुद्ध कहते हैं कि देह में रहकर भी देह से परे होना संभव है। हालांकि उसके लिए लंबी साधना और नैतिक आचरण की जरूरत पड़ती है। मोक्ष और निर्वाण दोनों ही अवस्थाओं में जीव जन्म-मरण के चक्र से छुटकारा पा लेता है। लेकिन मोक्ष मृत्यु के पार की अवस्थाहै। जबकि निर्वाण के लिए जीवन का अंत अनिवार्य नहीं।

गौतम बुद्ध ने सदेह अवस्था में निर्वाण प्राप्त किया था। जैन दर्शन के प्रवर्त्तकमहावीर स्वामी भी जीते जी कैवल्य-अवस्था को पा चुके थे। किंतु सभी तो उनके जैसे तपस्वी-साधक नहीं हो सकते। तब साधारण जन क्या करें। तो उसके लिए सभी धर्म-दर्शनों में एक ही मंत्र दिया गया है। और वह है अनासक्ति। संसार में रहकर भी संसार के बंधनों से मुक्ति, धन-संपत्ति की लालसा, संबंधों और मोहमाया के बंधनों से परे हो जाना, अपने-पराये के अंतर से छुटटी पा लेना, जो भी अपने पासहै उसको परमात्मा की अनुकंपा की तरह स्वीकार करना और अपनी हर उपलब्धि को ईश्वर के नाम करते जाना, यही मुक्ति तक पहुंचने का सहजमार्ग है। इसी को सहजयोग कहा गया है। उस अवस्था में कामनाओं का समाजीकरण होने लगता है। इच्छाएं लोकहित के साथ जुड़कर पवित्र हो जाती हैं। उस अवस्था में व्यक्ति का कुछ भी अपना नहीं रहता। वह परहित को अपना हित, जनकल्याण में निज कल्याणकी प्रतीति करने लगता है।

दूसरे शब्दों में मुक्ति का एक अर्थ निष्काम हो जाना भी है निष्काम होने का अभिप्राय निष्कर्म होना अथवा कर्म से पलायन नहीं है। कर्म करते हुए, सांसारिक कर्र्मो में अपनी लिप्तता बनाएरखकर भी निष्काम हो जाना सुनने में असंभव और विचित्र सा लगता है? नादान अकर्मण्यता को ही निष्काम्यता का पर्याय मान लेता है। कुछ लोग निष्काम होने के लिए संन्यास की शरण में जाते रहे हैं। लेकिन देह पर संन्यासी बाना धारण कर वन।वन घूमने से तो सचमुचका वैराग्य संभव नहीं। जब तक मन मोहमाया से ग्रस्त है तब तक कर्मसंन्यास की वास्तविक स्थिति कैसे संभव हो सकती है। इस उलझन को सुलझाने का रास्ता भी गीता मैं है। कृष्ण कहते हैं कि कर्म करो, मगर फल की इच्छा का त्याग कर दो। निष्काम कर्म यानी कर्म करते हुए कर्म का बोध न होने देना, यह प्रतीति बनाए रखना कि मैं तो निमित्तमात्र हूं, कर्ता तो कोई और है, ‘त्वदीयं वस्तु गोविंदम तुभ्यमेवसमप्यते’ भावना के साथ सारे कर्म, समस्त कर्मफलों को ईश्वर-निर्मित मानकर उसी को समर्पित करते चले जाना ही कर्मयोग है। कर्म करते हुए फल की वांछा का त्याग ही विकर्म है, और यह प्रतीति कि मैं तो केवल निमित्तमात्र हूं, जो किया परमात्मा के लिए किया, जो हुआ परमात्मा के इशारे पर उसी के निमित्त हुआ, यह धारणा कर्म को अकर्म की ऊंचाई जक पहुंचा देती है। संसार से भागकर कर्म से पलायन करने की अपेक्षा संसार में रहते हुए कर्मयोग को साधना कठिन है। इसीलिए तो श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि कर्मसंन्यास कर्मयोग की अपेक्षा श्रेष्ठ हो सकता है, तो भी कर्मयोगी होना कर्म संन्यासी की अपेक्षा विशिष्ट उससे बढ़कर है:

कर्मयोगेश्व कर्मसंन्यासयात निश्रेयंस कराभुवौ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात कर्मयोगी विशिष्यते।।

कर्मयोगी होना तलवार की धार पर चलकर मंजिल को तक पहुंचना है। सांसारिक प्रलोभनों से दूर होने के लिए उससे भाग जाना कर्म संन्यास में संभव है, मगर कर्मयोगी को तो संसार में रहते हुए ही उसके प्रलोभनों से निस्तार पाना होता है। ऐसे कर्मयोग को साधाकैसे जाए! संसार में रहकर उसके मोह से कैसे दूर रहा जाए, इसके लिए विभिन्न धर्मदर्शनों में अलग-अलग विधान हैं, हालांकि उनकामूलस्वर प्राय एक जैसा है। मुनिगण इसके लिए तत्व-चिंतन में लगे रहते हैं। ऋषिगण मानव-व्यवहार को नियंत्राित और मर्यादित रखने के लिए नूतन विधान गढ़ते रहते हैं। प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा चार पुरुषार्थों की अभिकल्पना भी इसी के निमित्त की गई है।हिंदू परंपरा के चारों पुरुषार्थ असल जीवन के विभिन्न अर्थों में बहुआयामी सिद्धियों के भी सूचक हैं। धर्मरूपी पुरुषार्थ को साधनेका अभिप्राय है, कि हम लोकाचार में पारंगत हो चुके हैं। संसार में रहकर क्या करना चाहिए, और क्या नहीं इस सत्य को जान चुके हैं। और हम जान चुके हैं कि यह समस्त चराचर सृष्टि, भांति।भांति के जीव, वन।वनस्पति एक ही परमचेतना से उपजे हैं। एक ही परम।पिताकी संतान होने के कारण हम सब भाई भाई हैं। ध्यान रहे कि धर्म का मतलब पुरुषार्थ के रूप में सिर्फ परमात्मा तक पहुंचने का, उसकोजानने की तैयारी करना अथवा जान लेना ही नहीं है। ये सब बातें अध्यात्म के खाते में आती हैं। तब धर्म क्या है?

इस बारे में मनुस्मृति मेंएक दृष्टांत दिया गया है। धर्म क्या है, यह जानने के लिए ऋषिगण भृगु मुनि के निकट पहुंचे। मुनि के समक्ष अपनी जिज्ञासा रखते हुए उन्होंने कहा—‘महाराज! हम धर्म जानना चाहते हैं?’ इसपर भृगु जी ने उत्तर दिया–‘जो अच्छे विद्वान लोग हैं, जो सबके प्रति कल्याण-भाव रखते हैं, वे जो आचरण करते हैं, सेवित करते हैं, उनके द्वारा जो आचरित होता है, वही धर्म है। धर्म की इस परिभाषा में न तो आत्मा है, न ही परमात्मा। दूसरे शब्दों में धर्म नैतिकता और सदाचरण का पर्याय है। भारतीय मेधा को अपने अद्वितीय तत्वचिंतन के कारण विश्वभर में सराहना मिली है। प्रमुख भारतीय दर्शनों न्याय, वैशेषिक, जैन, बौद्ध, चार्वाक, मीमांसा और वेदांत आदि सभी में विद्धान मुनिगण अपनी-अपनी तरह से जीवन और सृष्टि के रहस्यों की पड़ताल करने का प्रयास करते हैं। उनके दर्शन में कल्पना की अदभुत उड़ान है। इनमें से जैन, बौद्ध और वेदांत दर्शन तात्विक विवेचना के साथ।साथ जीवनको सरल और सुखमय बनाने के लिए व्यावहारिक सिद्धांत भी देते हैं। बौद्ध अष्ठधम्म पद की राह सुझाता है। जैन इसी तथ्य को और सहजता से जानने के लिए एक कहानी का सहारा लिया जा सकता है।  

एक राजा था। बहुत ही उदार,प्रजावत्सल। सभी का ख्याल रखने वाला। उसके राज्य में अनेक शिल्पकार थे। एक से बढ़कर एक, बेजोड़ राजा ने उन शिल्पकारों की दुर्दशा देखी तो उनके लिए एक बाजार लगाने का प्रयास किया। घोषणा की कि बाजार में संध्याकाल तक जो कलाकृति अनबिकी रहजाएगी, उसको वह स्वयं खरीद लगेगा। राजा का आदेश, बाजार लगने लगा।

एक दिन बाजार में एक शिल्पकार लक्ष्मी की ढेर सारी मूर्तियां लेकर पहुंचा। मूर्तियां बेजोड़ थीं। संध्याकाल तक उस शिल्पकार की सारी की सारी मूर्तियां बिक गईं। सिवाय एक के। वह मूर्ति अलक्ष्मी की थी। अब भला अलक्ष्मी की मूर्ति को कौन खरीदता! उस मूर्ति को न तो बिकना था, न बिकी। संध्या समय शिल्पकार उस मूर्ति को लेकरराजा के पास पहुंचा। मंत्री राजा के पास था। उसने सलाह दी कि राजा उस मूर्ति को खरीदने से इनकार कर दें। अलक्ष्मी की मूर्ति देखकर लक्ष्मीजी नाराज हो सकती हैं। लेकिन राजा अपने वचन से बंधा था।‘मैंने हाट में संध्याकाल तक अनबिकी वस्तुओं को खरीदने का वचन दिया है। अपने वचन का पालन करना मेरा धर्म है। मैं इसमूर्ति को खरीदने से मना कर अपने धर्म से नहीं डिग सकता।’और राजा ने वह मूर्ति खरीद ली।दिन भर के कार्यों से निवृत्त होकर राजा सोने चला तो एक स्त्री की आवाज सुनकर चौंक पड़ा।

राजा अपने महल के दरवाजे पर पहुंचा। देखा तो एक बेशकीमती वस्त्रा, रत्नाभूषण से सुसज्जित स्त्री रो रही है। राजा ने रोने का कारण पूछा।‘मैं लक्ष्मी हूं। वर्षों से आपके राजमहल में रहती आई हूं। आज आपने अलक्ष्मी की मूर्ति लाकर मेरा अपमान किया। आप उसको अभी इस महल से बाहर निकालें।’‘देवि, मैंने वचन दिया है कि संध्याकाल तक तो भी कलाकृति अनबिकी रह जाएगी, उसको मैं खरीद लूंगा।’‘उस कलाकार को मूर्ति का दाम देकर आपने अपने वचन की रक्षा कर ली है, अब तो आप इस मूर्ति को फेंक सकते हैं!’‘नहीं देवि, अपने राज्य के शिल्पकारों की कला का सम्मान करना भी मेरा धर्म है, मैं इस मूर्ति को नहीं फेंक सकता।’‘तो ठीक है, अपने अपना धर्म निभाइए। मैं जा रही हूं।’ राजा की बात सुनकर लक्ष्मी बोली और वहां से प्रस्थान कर गई। राजा अपने शयनकक्ष की ओर जाने के लिए मुड़ा। तभी पीछे से आहट हुई। राजा ने मुड़कर देखा, दुग्ध धवल वस्त्रााभूषण धारण किए एक दिव्यआकृति सामने उपस्थित थी। ‘आप?’ राजा ने प्रश्न किया। ‘मैं नारायण हूं। राजन आपने मेरी पत्नी लक्ष्मी का अपमान किया है। मैं उनके बगैर नहीं रह सकता। आप अपने निर्णय परपुनर्विचार करें।’‘मैं अपने धर्म से बंधा हूं देव।’ राजा ने विनम्र होकर कहा।‘तब तो मुझे भी जाना ही होगा।’ कहकर नारायण भी वहां से जाने लगे।

राजा फिर अपने शयनकक्ष में जाने को मुड़ा। तभी एकऔर दिव्य आकृति पर उसकी निगाह पड़ी। कदम ठिठक गए।‘आप भी इस महल को छोड़कर जाना चाहते हैं, जो चले जाइए, लेकिन मैं अपने धर्म से पीछे नहीं हट सकता।’यह सुनकर वह दिव्य आकृति मुस्कराई, बोली।‘मैं तो धर्मराज हूं। मैं भला आपको छोड़कर कैसे जा सकता हूं। मैं तो नारायणको विदा करने आया था।’उसी रात राजा ने सपना देखा। सपने में नारायण और लक्ष्मी दोनों ही थे। हाथ जोड़कर क्षमायाचना करते हुए-‘राजन हमसे भूल हुई है, जहां धर्म है, वहीं हमारा ठिकाना है। हम वापस लौट रहे हैं।’ और सचमुच अगली सुबह राजा जब अपने मंदिर में पहुंचा तो वहां नारायण और नारायणी दोनों ही थे।

आप ऐसी कथाओं पर चाहें विश्वास न करें। परंतु इस तरह की कथाएं रची जाती रही हैं, ताकि मनुष्य अपने कर्तव्यपथ से, नैतिकता से बंधा रहे। धर्म और अध्यात्म का घालमेल कुछ धार्मिक कूप-मंडूकता और स्वार्थी राजनेताओं के छल का परिणाम है। वास्तव में तो धर्म उनजीवनमूल्यों में आस्था और उनका अभिधारण है, जिनके अभाव में यह समाज चल ही नहीं सकता। जिनकी उपस्थिति उसके स्थायित्व केलिए अनिवार्य है। विभिन्न समाजों की आध्यात्मिक मान्यताओं, उनकी पूजा पद्धतियों में अंतर हो सकता है, मगर उनके जीवनमूल्य प्राय: एकसमान और अपरिवर्तनीय होते हैं। जब हम धर्म की बात करते हैं और यह मान लेते हैं कि हमें संसार में रहकर अध्यात्म को साधनाहै तो मामला नैतिकता पर आकर टिक जाता है। नैतिकता बड़ी ऊंची चीज है। यह कर्मयोगी को राह दिखाती है, कर्मसंन्यासी कापथ।प्रशस्त करती है। नैतिक होना मनसा, वाचा कर्मणा पवित्रा होना भी है। आचरण की पवितत्राता, मन की पवित्राता और देह की पवित्राताही मानवधर्म है। यहां जब हम देह की बात करते हैं तो उसके पीछे उसका पूरा परिवेश स्वत: ही समाहित हो जाता है।

मनुष्य बौद्ध धर्म में इसे अष्ठधर्म के सिद्धांत के आधार पर समझाया गया है।दूसरा हिंदू पुरुषार्थ है, अर्थ। संसार में जीने के लिए, सामाजिकता को बनाए रखने के लिए, आपसी व्यवहार को सुसंगत रूप में चलाने के लिए धन अत्यावश्यक है। वह जीवन-व्यवहार को सहज और सुगम बनाता है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धनकी महत्ता से इन्कार नहीं किया जा सकता। यह सामाजिक प्रतिष्ठा का मूल है। मगर यहां एक पेंच है। धन को पुरुषार्थ मान लेने का अर्थ यह नहीं है कि किसी भी तरीके से अर्जित किया गया धन पुरुषार्थ है। या धन है तो उसका हर उपयोग सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से मान्य है। चोरी, डकैती, वेश्यावृति और जुआ जैसे दुर्व्यसनों से अर्जित धन को समाज में हेय माना गया है। यहां तक कि उसका तिरष्कार भी किया जाता है।

मनुष्यता के उत्थान के लिए साध्य और साधन दोनों की पवित्रता जरूरी है। अत्यधिक धन अर्जित कर लेना, दूसरे के हिस्से का धन हड़प लेना भी पुरुषार्थ नहीं है। धन के पुरुषार्थ मानने का अभिप्राय उससे जुड़े समूचे व्यवहार के मानवीकरण से है। अस्तेय और अपरिग्रह जैसी शास्त्रीय व्यवस्थाएं धर्नाजन और उससे जुड़े प्रत्येक व्यवहार को मानवीय बनाए रखने के लिए की गई हैं। जिसका अभिप्राय है कि चोरी-डकैती अथवा लोकमान्य विधियों से अलग ढंग से अर्जित किया गया धन पाप है। धन उतना ही होना चाहिए जितना कि गृहस्थ जीवन को सुगम बनाए रखने के लिए आवश्यक है। कबीर ने धनार्जन को लेकर बहुत अर्थपूर्ण बात कही है। साधु इतना दीजिए जामे कुटुंब समाय,मैं भी भूखा न रहूं, साधू न भूखा जाए। धन का अपव्यय आलोचना का विषय है तो उसे व्यय करने के लिए समझदारी की जरूरत पड़ती है। वृथा आडंबरों, लोक-दिखावे, कोरी प्रतिष्ठा, जुआ एवं शराबखोरी जैसे दुर्व्यसनों पर खर्च करने के  पुरुषार्थ-सिद्धि असंभव है।

दूसरे शब्दों में धन को पुरुषार्थ की गरिमा से विभूषित करना, तत्संबंधी प्रत्येक व्यवहार को मानवीय रूप प्रदान करना है। इस तरह सिर्फ लोकमान्य विधि से अर्जित धन को लोकमान्य तरीकों से खर्च करने में ही में पुरुषार्थ-सिद्धि संभव है। काम को हिंदू-परंपरा तीसरे पुरुषार्थ के रूप में मानती है। संसार को गतिमान बनाए रखने के लिए काम अत्यावश्यक है। इससे संततिचक्र आगे बढ़ता है। इसके लिए भी धार्मिक व्यवस्थाएं है। मुक्त, उच्छ्रंखल काम-संबंध समाज-व्यवस्था को न केवल धराशायी कर सकते हैं, बल्कि उसमें इतना विक्षोभ पैदा कर सकते हैं कि यह पूरा का पूरा सिस्टम ही छिन्न-भिन्न हो जाए। काम को नियमित-नियंत्रित करने के लिए ही विभिन्न सामाजिक संबंधों की व्यवस्था हुई है, उनके लिए मर्यादाएं निश्चित की गईं।

नैतिकता को बनाए रखने के लिएजो नियम बने उन्हें धर्म और धार्मिकता का आवरण प्रदान किया गया, जिससे वे अधिक से अधिक लोगों के लिए सहज ग्राहय: हो सकें। यहां तक कि उनके साथ आस्था का प्रसंग भी जोड़ा गया, ताकि वृहद सामाजिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उन्हें कुछेक व्यक्तियों के हित में तोड़ा-मरोड़ा न जा सके। वैवाहिक संस्था के गठन का प्रमुख उददेश्य काम-संबंधों को सामाजिक मर्यादा के दायरे में लाना ही है। निर्धारित कसौटियों पर खरे उतरने वाले काम-संबंध ही तीसरे पुरुषार्थ के रूप में मान्य कहे जा सकते हैं। प्रथम तीनों पुरुषार्थों की सिद्धि के साथ मनुष्य जब धर्म को अपना आचरण बना लेता है, सदाचार और सदव्यवहार उसके रोजमर्रा के जीवन का अंग बन जाते हैं, ‘अर्थ’और ‘काम’ के बीच जब वह संतुलन कायम कर चुका होता है, तब वह साधारण लोगों के स्तर से बहुत ऊपर पहुंच उठ जाता है, इसी को परमात्मा के करीब पहुंच जाना कहते हैं। यही मोक्ष की अवस्था है, जहां सिर्फ पवित्राता ही पवित्राता है। किसी भी प्रकार का विक्षोभ याविकार नहीं। यदि कोई विक्षोभ है, यदि कहीं विकार अथवा असंगति नजर आती है, तो दोष हमारी दृष्टि का है, उस विधान का है जो हमने अपनी सुविधा के हिसाब से प्राकृतिक नियमों को ताक पर रखकर रचा है।

हिंदू धर्म के चारों पुरुषार्थ मानव जीवन को मर्यादित करते हैं। मनुष्य को सिखाते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। लेकिन आप इसे जनसामान्य की दुनिया से उकताहट का परिणाम माने अथवा उसकी अपने आराध्य के प्रति समर्पण की तीव्र अभिलाषा, या फिर अलभ्य को पा लेने की जनसामान्य की सहज स्वाभाविक लालसा, जिसके कारण वह मात्रा नियंत्रित जीवनचर्या यानी पुरुषार्थ-चातुर्य प रनिर्भर नहीं रहना चाहता। मोक्ष की कामना उसको वैकल्पिक रास्तों तक ले ही जाती है। धर्मशास्त्रां में मुक्ति यानी परमात्मा को पाने के जोदो प्रमुखमार्ग बताए गए हैं, पहला है ज्ञानमार्ग। वस्तुत: मानव जिज्ञासा की पहली उड़ान इस सृष्टि और उसके रचियता के बारे में जान लेनेके बोध के साथ ही हुई थी। ज्ञानमार्गी के अनुसार ईश्वर की दी गई इंद्रियां और दिमाग उस तक पहुंचने का सर्वोत्तम माध्यम हैं। परमात्माको जान लेना ही उसको प्राप्त कर लेना है।ज्ञानमार्गी इसी विश्वास के साथ चिंतन।मनन में डूबे रहते थे। उनकी ज्ञानसाधना के सुफल के रूप में अनेक दर्शनों का जन्म हुआ। वेद, उपनिषद आदि महान ग्रंथों की रचना हुई।

ये उदाहरण सिर्फ भारत के हैं। विश्व की बाकी सभ्यताओं में सृष्टि से जुड़ी जिज्ञासा ने भी अनेक दर्शनों को जन्म दिया है। हालांकि इस क्षेत्रा में उनकी उपलब्धियां भारतीय मेधा का ही अनुसरण करती हुई नजर आईं। बल्कि कहना चाहिए कि वे भारतीय वांङमय की उत्कष्टृ व्याख्या अथवा पुनर्प्रस्तुति से आगे न बढ़ सकीं।ज्ञानमार्गी परंपरा को विस्तार देते हुए आदि शंकराचार्य ने नवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में अद्वैत दर्शन का विचार प्रस्तुतकिया था। उन्होंने जैमिनी के मीमांसा दर्शन द्वारा पोषित-प्रेरित और रूढ़ हो चुके कर्मकांड़ों तथा लोकायतों के विशुद्ध भौतिकवादी दर्शन केस्थान पर वेदांत दर्शन को स्थापित किया। इसके लिए उन्होंने देश के विभिन्न भागों में जाकर बौद्धों और मीमांसकों से गंभीर शास्त्राार्थ किएथे, जिनमें उनका मंडन मिश्र के साथ हुआ शास्त्रार्थ जगत-प्रसिद्ध है। अपनी अप्रतिम प्रतिभा के बल पर शंकराचार्य ने परमात्मा को अनित्य,अनादि, अनंत, अनश्वर, अविकल्प सत्ता माना था।

इसके समानांतर उनके परिवर्ती रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत दर्शन का सिद्धांत रखा। दोनों के ही विचारों में अवतारवाद को मान्यता दी गई थी, लेकिन शंकराचार्य द्वारा प्रतिपादित दर्शन में जीवन और सृष्टि के रहस्यों परअर्थिक तार्किक दृष्टि से विचार किया गया था। सृष्टि के मूल के रूप में शंकराचार्य ने ‘बृह्म सत्यं जगन्न्मिथ्या’ की अवधारणा के साथ जिसनिस्सीम, निर्विकल्प, अनादि और अनंत परमसत्ता की संकल्पना समाज के सामने रखी, वह वेदों और उपनिषदों से उदभूत थी, जिसके आगे ईश्वर और उसके अवतारों को बहुत कम महत्त्व दिया गया था। दूसरी ओर रामानुज ने सदेह ईश्वरवाद को महत्त्व देते हुए विष्णु को सृष्टि का पालक और संचालक माना। वेदांत दर्शन के अंतर्गत शंकराचार्य ने सृष्टि की तत्वमींमासीय व्याख्या की थी, उनके द्वारा स्थापित चारमठों में प्रमुख गोवर्धनपीठ का तो मुख्यवाक्य ही ‘प्रज्ञानम बृह्म’ (ज्ञान ही बृह्म) है। लेकिन जनसाधारण के लिए उन्होंने भक्ति को भी पर्याप्तमहत्ता दी। यही कारण है कि शंकराचार्य और उनका दर्शन स्मार्त्त और वैष्णव दोनों संप्रदायों में एकसमान प्रतिष्ठा प्राप्त कर सका। शंकराचार्य के प्रयासों से हिंदू धर्म संगठित हुआ। मगर कुछ ही अर्से बाद ज्ञान की उस परंपरा में ठहराव आने लगा।

कुछ स्वार्थी,धर्मान्ध और कर्मकांड-प्रिय लोगों ने अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए समाज को जातीय आधार पर विभाजित करना आरंभ कर दिया।यहां तक कि वेद-शास्त्रां और पूजा-पद्धति के आधार पर भी नए।नए संप्रदाय बनने लगे। जातीय।स्तरीकरण को शास्त्रीय आधार प्रदान करनेके लिए स्मृति और पुराण गढ़े जाने लगे। परिणाम यह हुआ कि परमसत्ता के प्रतीक अनादि, अनश्वर, निराकार, निगुण ‘बृह्म’ का स्थान दो हाथ, दो पांव वाले देवताओं ने ले लिया। कर्मकांड और वर्गभेद के समर्थन पर टिकी इस व्यवस्था का ज्ञान की पुरातन परंपरा से कोई लगाव न था। विभिन्न मताबलंबियों के बीच आए दिन के विवाद छिड़ने और बहस का स्तर नीचे जाने से प्रचलित दार्शनिक मान्यताओं कास्थूलीकरण होने लगा। परिणामस्वरूप चिंतनधारा सूखने लगी। कर्मकांडों और रूढ़ियों में फंसा धर्म अपनी ही मूल स्थापनाओं से परे हटने लगा।

इस नई परंपरा में जनसाधारण के लिए, सिवाय उसके सामाजिक आर्थिक सामाजिक शोषण के कोई और स्थान न था। एक के बाद एक दर्शनों की खोज एवं विशद चिंतनपरक भीमकाय ग्रंथों की रचना के बावजूद जब मुनिगण ज्ञान के द्वारापरमात्मा और उसकी सृष्टि के बारे में उठे प्रश्नों का सही और सटीक जबाव देने में नाकाम रहे तो लोगों को लगने लगा कि मनुष्य के बुद्धि विवेक की भी सीमा है। इनके माध्यम से जीवन और संसार की अनेक समस्याओं को सुलझाया तो जा सकता है, मनुष्य की भौतिक आवश्यकताओं को नित नए रूप और उड़ान भी दी जा सकती है। मगर इससे सृष्टि और उसकी संरचना से जुड़े अनगिनत प्रश्नों को पूरी तरह हल नहीं किया जा सकता।

 

NEXT PAGE =>

भारतीय चिन्तन धारा में जिन दर्शनों की परिगणना विद्यमान है, उनमें शीर्ष स्थानीय दर्शन कौन सा है ? ऐसी जिज्ञासा होने पर एक ही नाम उभरता है, वह है-वेदान्त। यह भारतीय दर्शन के मन्दिर का जगमगाता स्वर्णकलश है- दर्शनाकाश का देदीप्यमान सूर्य है। वेदान्त की विषय वस्तु, इसके उद्देश्य, साहित्य और आचार्य परम्परा आदि पर गहन चिन्तन करें, इससे पूर्व आइये, वेदान्त शब्द का अर्थ समझें।

वेदान्त का अर्थ-

वेदान्त का अर्थ है- वेद का अन्त या सिद्धान्त। तात्पर्य यह है- ‘वह शास्त्र जिसके लिए उपनिषद् ही प्रमाण है। वेदांत में जितनी बातों का उल्लेख है, उन सब का मूल उपनिषद् है। इसलिए वेदान्त शास्त्र के वे ही सिद्धान्त माननीय हैं, जिसके साधक उपनिषद् के वाक्य हैं। इन्हीं उपनिषदों को आधार बनाकर बादरायण मुनि ने ब्रह्मसूत्रों की रचना की।’ इन सूत्रों का मूल उपनिषदों में हैं। जैसा पूर्व में कहा गया है- उपनिषद् में सभी दर्शनों के मूल सिद्धान्त हैं।

वेदान्त का साहित्य

ब्रह्मसूत्र- उपरिवर्णित विवेचन से स्पष्ट है कि वेदान्त का मूल ग्रन्थ उपनिषद् ही है। अत: यदा-कदा वेदान्त शब्द उपनिषद् का वाचक बनता दृष्टिगोचर होता है। उपनिषदीय मूल वाक्यों के आधार पर ही बादरायण द्वारा अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादन हेतु ब्रह्मसूत्र सृजित किया गया। महर्षि पाणिनी द्वारा अष्टाध्यायी में उल्लेखित ‘भिक्षुसूत्र’ ही वस्तुत: ब्रह्मसूत्र है। संन्यासी, भिक्षु कहलाते हैं एवं उन्हीं के अध्ययन योग्य उपनिषदों पर आधारिक पराशर्य (पराशर पुत्र व्यास) द्वारा विरचित ब्रह्म सूत्र है, जो कि बहुत प्राचीन है।

यही वेदांत दर्शन पूर्व मीमांसा के नाम से प्रख्यात है। महर्षि जैमिनि का मीमांसा दर्शन पूर्व मीमांसा कहलाता है, जो कि द्वादश अध्यायों में आबद्ध है। कहा जाता है कि जैमिनि द्वारा इन द्वादश अध्यायों के पश्चात् चार अध्यायों में संकर्षण काण्ड (देवता काण्ड) का सृजन किया था। जो अब अनुपलब्ध है, इस प्रकार मीमांसा षोडश अध्यायों में सम्पन्न हुआ है। उसी सिलसिले में चार अध्यायों में उत्तर मीमांसा या ब्रह्म-सूत्र का सृजन हुआ। इन दोनों ग्रन्थों में अनेक आचार्यों का नामोल्लेख हुआ है। इससे ऐसा अनुमान होता है कि बीस अध्यायों के रचनाकार कोई एक व्यक्ति थे, चाहे वे महर्षि जैमिनि हों अथवा बादरायण बादरि। पूर्व मीमांसा में कर्मकाण्ड एवं उत्तर मीमांसा में ज्ञानकाण्ड विवेचित है। उन दिनों विद्यमान समस्त आचार्य पूर्व एवं मीमांसा के समान रूपेण विद्वान् थे। इसी कारण जिनके नामों का उल्लेख जैमिनीय सूत्र में है, उन्हीं का ब्रह्मसूत्र में भी है। वेदान्त संबंधी साहित्य प्रचुर मात्रा में विद्यमान है, जिसका उल्लेख अग्रिम पृष्ठों पर ‘वेदान्त का अन्य साहित्य और आचार्य परम्परा’ शीर्षक में आचार्यों के नामों सहित विवेचित किया गया है।

वेदान्त दर्शन का स्वरूप और प्रतिपाद्य-विषय

‘वेदों’ के सर्वमान्य, सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त ही ‘वेदान्त’ का प्रतिपाद्य हैं। उपनिषदों में ही ये सिद्धान्त मुख्यत: प्रतिपादित हुए हैं, इसलिए वे ही ‘वेदान्त’ के पर्याय माने जाते हैं। परमात्मा का परम गुह्य ज्ञान वेदान्त के रूप में सर्वप्रथम उपनिषदों में ही प्रकट हुआ है। ‘वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था:…..’(मुण्डक. )। ‘वेदान्ते परमं गुह्यम् पुराकल्पे प्रचोदितम्’ (श्वेताश्ववतर. ) ‘यो वेदादौ स्वर: प्रोक्तो वेदान्ते च प्रतिष्ठित:’ (महानारायण, ) इत्यादि श्रुतिवचन उसी तथ्य का डिंडिम घोष करते हैं। इन श्रुति वचनों का सारांश इतना ही है कि संसार में जो कुछ भी दृश्यमान है और जहाँ तक हमारी बुद्धि अनुमान कर सकती है, उन सबका का मूल स्रोत्र एकमात्र ‘परब्रह्म’ ही है।

इस प्रकार ब्रह्मसूत्र प्रमुखतया ब्रह्म के स्वरूप को विवेचित करता है एवं इसी के संबंध से उसमें जीव एवं प्रकृति के संबंध में भी विचार प्रकट किया गया है। यह दर्शन चार अध्यायों एवं सोलह पादों में विभक्त है। इनका प्रतिपाद्य क्रमश: निम्रवत् है-

1-    प्रथम अध्याय में वेदान्त से संबंधित समस्त वाक्यों का मुख्य आशय प्रकट करके उन समस्त विचारों को समन्वित किया गया है, जो बाहर से देखने पर परस्पर भिन्न एवं अनेक स्थलों पर तो विरोधी भी प्रतीत होते हैं। प्रथम पाद में वे वाक्य दिये गये हैं, जिनमें ब्रह्म का स्पष्टतया कथन है, द्वितीय में वे वाक्य हैं, जिनमें ब्रह्म का स्पष्ट कथन नहीं है एवं अभिप्राय उसकी उपासना से है। तृतीय में वे वाक्य समाविष्ट हैं, जिनमें ज्ञान रूप में ब्रह्म का वर्णन है। चतुर्थ पाद में विविध प्रकार के विचारों एवं संदिग्ध भावों से पूर्ण वाक्यों पर विचार किया गया है।

2-    द्वितीय अध्याय का विषय ‘अविरोध’ है। इसके अन्तर्गत श्रुतियों की जो परस्पर विरोधी सम्मतियाँ हैं, उनका मूल आशय प्रकट करके उनके द्वारा अद्वैत सिद्धान्त की सिद्धि की गयी है। इसके साथ ही वैदिक मतों (सांख्य, वैशेषिक, पाशुपत आदि) एवं अवैदिक सिद्धान्तों (जैन, बौद्ध आदि) के दोषों एवं उनकी अयथार्थता को दर्शाया गया है। आगे चलकर लिंग शरीर प्राण एवं इन्द्रियों के स्वरूप दिग्दर्शन के साथ पंचभूत एवं जीव से सम्बद्ध शंकाओं का निराकरण भी किया गया है।

3-    तृतीय अध्याय की विषय वस्तु साधना है। इसके अन्तर्गत प्रथमत: स्वर्गादि प्राप्ति के साधनों के दोष दिखाकर ज्ञान एवं विद्या के वास्तविक स्रोत्र परमात्मा की उपासना प्रतिपादित की गयी है, जिसके द्वारा जीव ब्रह्म की प्राप्ति कर सकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में कर्मकाण्ड सिद्धान्त के अनुसार मात्र अग्निहोत्र आदि पर्याप्त नहीं वरन् ज्ञान एवं भक्ति द्वारा ही आत्मा और परमात्मा का सान्निध्य सम्भव है।

4-    चतुर्थ अध्याय साधना का परिणाम होने से फलाध्याय है। इसके अन्तर्गत वायु, विद्युत एवं वरुण लोक से उच्च लोक-ब्रह्मलोक तक पहुँचने का वर्णन है, साथ ही जीव की मुक्ति, जीवन्मुक्त की मृत्यु एवं परलोक में उसकी गति आदि भी वर्णित है। अन्त में यह भी वर्णित है कि ब्रह्म की प्राप्ति होने से आत्मा की स्थिति किस प्रकार की होती है, जिससे वह पुन: संसार में आगमन नहीं करती। मुक्ति और निर्वाण की अवस्था यही है। इस प्रकार वेदान्त दर्शन में ईश्वर, प्रकृति, जीव, मरणोत्तर दशाएँ, पुनर्जन्म, ज्ञान, कर्म, उपासना, बन्धन एवं मोक्ष इन दस विषयों का प्रमुख रूप से विवेचन किया गया है।

वेदान्त का अन्य साहित्य और आचार्य  परम्परा

ब्रह्मसूत्र के अतिरिक्त वेदान्त दर्शन का और भी साहित्य प्रचुर मात्रा में संप्राप्त होता है, जो विभिन्न आचार्यों ने विविध प्रकारेण ब्रह्म-सूत्र आदि ग्रन्थों पर भाष्य, वृत्तियाँ टीकाएँ आदि लिखी हैं। यद्यपि प्राचीन आचार्यों में बादरि, आश्मरथ्य, आत्रेय, काशकृत्स्न, औडुलोमि एवं कार्ष्णाजिनि आजि के मतों का भी वर्णन प्राप्त है; किन्तु इनके ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं। आइये जो ग्रन्थ उपलब्ध हैं, उनका व उनके आचार्यों का संक्षिप्त परिचय प्राप्त करें।

श्रृंगेरी पीठ के प्रतिष्ठित यति श्री विद्यारण्य स्वामी ने वेदान्त विषयक कई ग्रन्थ लिखे, जिनमें ‘पंचदशी’ का विशेष स्थान है। इनके अन्य ग्रन्थ हैं- जीवन्मुक्ति विवेक, विवरण प्रमेय संग्रह, बृहदारण्यक वार्तिक सार आदि।

1-    आद्य शंकराचार्य– ब्रह्म-सूत्र पर सर्वप्राचीन एवं प्रामाणिक भाष्य आद्य शंकराचार्य का उपलब्ध होता है। यह शांकरभाष्य के नाम से प्रख्यात है। विश्व में भारतीय दर्शन एवं शंकराचार्य के नाम से जितनी ख्याति प्राप्त की है, उतनी न किसी आचार्य ने प्राप्त की और न ग्रन्थ ने। शंकराचार्य का जन्म 788 ई. में तथा निर्वाण 820 ई. में हुआ बताया जाता है, इनके गुरु गोविन्दपाद तथा परम गुरु गौड़पादाचार्य थे। इनके ग्रन्थों में ब्रह्मसूत्र-भाष्य (शारीरिक भाष्य), दशोपनिषद् भाष्य, गीता-भाष्य, माण्डूक्यकारिका भाष्य, विवेकचूड़ामणि, उपदेश-साहस्री आदि प्रमुख हैं।

2-    भास्कराचार्य– आचार्य शंकर के समकालीन भास्कराचार्य त्रिदण्डीमत के वेदन्ती थे। ये ज्ञान एवं कर्म दोनों से मोक्ष स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार ब्रह्म के शक्ति-विक्षेप से ही सृष्टि और स्थिति व्यापार अनवरत चलता है। इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर एक लघु भाष्य लिखा है।

3-    सर्वज्ञात्म मुनि–  ये सुरेश्वराचार्य के शिष्य थे, जिन्होंने ब्रह्मसूत्र पर एक पद्यात्मक व्याख्या लिखी है, जो ‘संक्षेप-शारीरिक’ नाम से प्रसिद्ध है।

4-    अद्वैतानन्द–  ये रामानन्द तीर्थ के शिष्य थे, इन्होंने शंकराचार्य की शारीरिक भाष्य पर ‘ब्रह्मविद्याभरण’ नामक श्रेष्ठ व्याख्या लिखी है।

5-    वाचस्पति मिश्र–  वाचस्पति मिश्र ने भी शांकर- भाष्य पर ‘भामती’ नामक उत्तम व्याख्या ग्रन्थ लिखा है। ‘ब्रह्मतत्त्व समीक्षा’ नामक वेदान्त ग्रन्थ इन्हीं का है।

6-    चित्सुखाचार्य–  तेरहवीं सदी के चित्सुखाचार्य ने वेदान्त का प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘तत्त्व-दीपिका’ नाम से लिखा, जिसने उन्हीं के नाम से ‘चित्सुखी’ के रूप में विशेष प्रसिद्धि प्राप्त की।

7-    विद्यारण्य स्वामी

8-    प्रकाशात्मा– इन्होंने पद्मपादकृत पंचपादिका पर ‘विवरण’ नाम की व्याख्या का सृजन किया है। इसी के आधार पर ‘भामती प्रस्थान’ से पृथक् ‘विवरण प्रस्थान’ निर्मित हुआ है।

9-    अमलानन्द–  अमलानन्द (जो अनुभवानन्द के शिष्य थे) ने भामती पर ‘कल्पतरु’ नामक व्याख्या एवं ब्रह्मसूत्र पर एक वृत्ति भी लिखी है। इसका अपर नाम ‘व्यासाश्रम’ था।
 

मानव जीवन का लक्ष्य एवं सांसारिक स्थिति में विवेचना अनुभवों के आधार पर करने वाला न्यायदर्शन, वस्तुवाद का पोषक है। इसके अनुसार जीवन का परम लक्ष्य मोक्ष है, जिसके द्वारा दु:खों की पूर्णत: निवृत्ति हो जाती है।

न्याय के मतानुसार जीवात्मा कर्त्ता एवं भोक्ता होने के साथ-साथ, ज्ञानादि से सम्पन्न नित्य तत्त्व है। यह जहाँ वस्तुवाद को मान्यता देता है, वहीं यथार्थवाद का भी पूरी तरह अनुगमन करता है। मानव जीवन में सुखों की प्राप्ति का उतना अधिक महत्त्व नहीं है, जितना कि दु:खों की निवृत्ति का। ज्ञानवान् हो या अज्ञानी, हर छोटा बड़ा व्यक्ति सदैव सुख प्राप्ति का प्रयत्न करता ही रहता है। सभी चाहते हैं कि उन्हें सदा सुख ही मिले, कभी दु:खों का सामना न करना पड़े, उनकी समस्त अभिलाषायें पूर्ण होती रहें, परन्तु ऐसा होता नहीं। अपने आप को पूर्णत: सुखी कदाचित् ही कोई अनुभव करता हो।

जिनको भरपेट भोजन, तक ढकने के लिए पर्याप्त वस्त्र तथा रहने के लिए मकान भी ठीक से उपलब्ध नहीं तथा दिन भर रोजी-रोटी के लिए मारे मारे फिरते हैं, उनकी कौन कहे; जिनके पास पर्याप्त धन-साधन, श्रेय-सम्मान सब कुछ है, वे भी अपने दु:खों का रोना रोते देखे जाते हैं। आखिर ऐसा क्यों है ? क्या कारण है कि मनुष्य चाहता तो सुख है; किन्तु मिलता उसे दु:ख है। सुख-संतोष के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते हुए भी वह अनेकानेक दु:खों एवं अभावों को प्राप्त होता रहता है। आज की वैज्ञानिक समुन्नति से, पहले की अपेक्षा कई गुना सुख के साधनों में बढ़ोत्तरी होने के उपरान्त भी स्थायी समाधान क्यों नहीं मिल सका ? जहाँ साधन विकसित हुए वहीं जटिल समस्याओं का प्रादुर्भाव भी हुआ। मनुष्य शान्ति-संतोष की कमी अनुभव करते हुए चिन्ताग्रस्त एवं दु:खी ही बना रहा। यही कारण है कि मानव जीवन में प्रसन्नता का सतत अभाव होता जा रहा है।

इन समस्त दु:खों एवं अभावों से मनुष्य किस प्रकार मुक्ति पा सकता है, प्राचीन ऋषियों-मनीषियों एवं भारतीय तत्त्वदर्शी महापुरुषों ने इसके लिए कई प्रकार के मार्गों का कथन किया है, जो प्रत्यक्ष रूप से भले ही प्रतिकूल व पृथक् प्रतीत होते हों; परन्तु पात्र व रुचि के आधार पर सबका- अपना-अपना सच्चा दृष्टिकोण है। एक मार्ग वह है जो आत्मस्वरूप के ज्ञान के साथ-साथ भौतिक जगत् के समस्त पदार्थों के प्रति आत्मबुद्धि का भाव रखते हुए पारलौकिक साधनों का उपदेश देता है। दूसरा मार्ग वह है जो जीवमात्र को ईश्वर का अंश बतलाकर, जीवन में सेवा व भक्तिभाव के समावेश से लाभान्वित होकर आत्मलाभ की बात बतलाता है। तीसरा मार्ग वह है जो सांसारिक पदार्थों एवं लौकिक घटनाक्रमों के प्रति सात्विकता पूर्ण दृष्टि रखते हुए, उनके प्रति असक्ति न होने को श्रेयस्कर बताता है।

इसी तीसरे मार्ग का अवलम्बन न्यायदर्शन करता है, जबकि वह ईश्वरोपासना, पुनर्जन्म, लोक-परलोक, आत्मा आदि में भी भरपूर आस्था रखने वाली है, फिर भी इन सबकी सम्यक् उपलब्धि तथा इहलौकिक एवं परलौकिक जीवन की सफलता हेतु भौतिक जगत् के पदार्थों एवं उससे संबंधित घटनाओं का कथन करता है। न्याय का मानना है कि जो भी ज्ञान मनुष्य को उपलब्ध है, वह इन्द्रियों व मन-बुद्धि के माध्यम से ही प्राप्त हुआ करता है। इन सबमें विकृति उत्पन्न होने की स्थिति में उपलब्ध ज्ञान भी उसी अनुपात में विकारयुक्त हो जाने के कारण उस विकृत ज्ञान का आधार लेकर जो भी निर्णय लिया जायेगा तथा उससे किसी उद्देश्य विशेष की पूर्ति नहीं की जा सकेगी। इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायशास्त्र ने यह सैद्धान्तिक अभिव्यक्ति की है कि संसार में न आने के पश्चात् यदि मनुष्य सत्कर्म व सद्व्यवहार के माध्यम से अपने दु:खों को दूर करना चाहे, तो सांसारिक संरचना में प्रयुक्त होने वाले जड़-चेतन सभी पदार्थों का वास्तविक स्वरूप भी जाने समझे। अनेक तरह के मतानुयायियों ने अपने अपने विचार से पदार्थों का स्वरूप भिन्न-भिन्न प्रकार का बतलाया है, जिसके कारण मनुष्य भ्रम में पड़ जाता है। इस भ्रमात्मकतापूर्ण स्थिति से छुटकारा दिलाने के लिए न्यायशास्त्र ने तर्क व साक्ष्यों की ऐसी सुन्दर विचारधारा प्रस्तुत की है, जिससे पदार्थों के सही स्वरूप का निर्णय किया जा सके।

जिन साधनों से हमें ज्ञेय तत्त्वों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, उन्हीं साधनों को ‘न्याय’ की संज्ञा दी गई है। कहा भी है कि-

‘‘नीयते विवक्षितार्थ: अनेन इति न्याय:।’’

गौतम के ‘न्याय सूत्र’ से ही न्यायशास्त्र का इतिहास स्पष्ट रूप से प्रारम्भ होता है। प्राचीन ग्रन्थों में इस न्यायशास्त्र के कतिपय सिद्धान्तों की चर्चा तो आज भी विशद रूप से उपलब्ध है; परन्तु उस प्राचीन तर्कशास्त्र का सम्यक् एवं सर्वांगपूर्ण स्वरूप क्या और कैसा था, इसका सही ज्ञान किसी को नहीं है। ‘बौद्ध दर्शन’ के प्रकरणों में यह उल्लेख मिलता है कि बौद्ध मत वाले अपने मत का प्रतिपादन आस्तिक सिद्धान्तों के विरुद्ध किया करते थे। इसी का प्रतिषेध करने हेतु न्यायदर्शन की संरचना हुई। आगे इसका वर्णन किया जा रहा है। बुद्घ का समय छठी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है। यही वह समय था जब गौतम ने न्यायशास्त्र की रचना की। न्यायदर्शन का एक नाम तर्कशास्त्र भी है। प्राचीन ग्रन्थ शास्त्रों में किन्हीं-किन्हीं स्थानों में गौतम तथा कहीं-कहीं अक्षपाद को न्यायदर्शन का रचयिता कहा गया है। आचार्य विश्वेश्वर की तर्कभाषा की भूमिका के अन्तर्गत  में इसका उल्लेख है। उमेश मिश्र द्वारा रचित भारतीय दर्शन में कहा गया है कि तर्कशास्त्र बौद्धों के पहले भी था और वह बड़ा व्यापक था। इसके भिन्न-भिन्न प्राचीन नाम हैं। यथा-आन्तीक्षकी, हेतुशास्त्र, हेतुविद्या, तर्कशास्त्र, तर्कविद्या, वादविद्या, प्रमाणशास्त्र, वाकोवाक्य, तक्की, विमंसि आदि।

न्यायसूत्र की संरचना कब हुई, इसका निर्णय कर पाना बहुत कठिन है। कारण कि विद्वानों ने ई. पू. छठवीं शताब्दी से लेकर ईसा पूर्व पाँचवी शताब्दी के बीच अपनी मान्यतायें प्रस्तुत की हैं; परन्तु सबके अपने-अपने पक्ष तर्कयुक्त हैं। उससे किसी निश्चित निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता।

चार्वाक एक प्रसिद्ध अनीश्वरवादी और नास्तिक विद्वान। बार्हस्पत्य। (चार्वाक दर्शन के रचियता) .उक्त विद्वान द्वारा चलाया हुआ मत या दर्शन जो‘लोकायत’ कहलाता है। चार्वाक दर्शन मूल रूप से भौतिकवाद पर आधारित है।


 
जो ईश्वर को माने वह आस्तिक तथा जो ईश्वर को न माने वह नास्तिक। इसी अर्थ के आधार पर उन्होंने भारत के दर्शन–सम्प्रदायों का भी विभाजन कर रखा है। इनके हिसाब से सांख्य–योग, न्याय–वैशेषिक तथा मीमांसा–वेदान्त तो आस्तिक सम्प्रदाय हैं जबकि जैन–बौद्ध और चार्वाक नास्तिक सम्प्रदाय हैं। इसमें मजेदार बात यह है कि भारत के प्राचीनतम दार्शनिक सम्प्रदाय सांख्य सम्प्रदाय को इन कथित बुद्धिजीवियों ने आस्तिक सम्प्रदायों में शामिल कर रखा है जबकि सांख्य वाले ईश्वर को मानते ही नहीं, इस आधार पर कि उनके सम्पूर्ण सृष्टि–विवेचन में, सांख्य दार्शनिकों के मतानुसार, ईश्वर की कोई भूमिका ही नहीं है।

दरअसल भारत की सम्पूर्ण दार्शनिक परंपरा में ज्ञान का महत्व तो है, जन्म–बंधन–मोक्ष का महत्व तो है, पर ईश्वर का कोई महत्व, या फिर कोई निर्णायक महत्व है ही नहीं, जैसा कि पश्चिम से भारत आई विदेशी विचारधाराओं में है। इसलिए भारत की दर्शन–परंपरा का अध्ययन और विवेचन ईश्वर को केन्द्र में रखकर हो ही नहीं सकता, और हुआ भी नहीं है। ईश्वर का, उसके प्रतिनिधि रूप ब्रह्मा–विष्णु–शिव–शक्ति का और उनके राम, कृष्ण सरीखे दस या चौबीस ही नहीं, बल्कि सभी पूर्णावतारों–अंशावतारों का मामला महाकाव्य–पुराणों का तो है, दर्शन ग्रंथों का नहीं है।

भारत की बौद्धिक परंपरा में सिर्फ चार्वाक को ही नास्तिक दर्शन माना गया है और इसके अलावा शेष सभी दर्शन आस्तिक दर्शन ही हैं। क्यों? इसलिए कि हमारे देश में नास्तिक सिर्फ उसे माना गया है जो पश्चिम की परिभाषा वाले धर्म या ईश्वर का नहीं, बल्कि वेद का निंदक या विरोधी माना गया है – ‘नास्तिको वेदनिन्दक:’, अर्थात जो वेद की निन्दा करे वह नास्तिक है। चार्वाक के अलावा किसी ने भी, सांख्य से लेकर बौद्ध, जैन, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त तथा परवर्ती रामानुजी, रामानन्दी, सिख, उदासी, गोरखपंथी, नाथ, सिद्ध, राधास्वामी, आर्य समाज, आ॓शो तक जितने भी असंख्य विचार सम्प्रदाय हमारे देश में हुए हैं, किसी ने भी वेदों की निंदा नहीं की। इसलिए, आज खुद को भारतीय परंपरा का उत्तराधिकारी मानने वाले विद्वान अगर दर्शन सम्प्रदायों को नास्तिक–आस्तिक के वर्ग में रखते हैं और बौद्ध, जैन आदि को नास्तिक सम्प्रदाय मानने का वैचारिक अपराध करते हैं तो वे यह अपराध आज के महाब्राह्मणों के असर के कारण ही अज्ञानवश कर रहे हैं।

क्यों नहीं की किसी ने वेदों की निंदा? इसलिए नहीं कि वेद कोई धर्मग्रंथ हैं, किसी मसीहा का इलहाम हैं या ईश्वर का या उसके किसी सगे–संबंधी की शुभ सूचनाएं हैं। भारत की बौद्धिक परंपरा इनमें से किसी भी बात को स्वीकार ही नहीं करती। ये बातें इस परंपरा की सोच का हिस्सा हैं ही नहीं। वेद की निंदा किसी ने नहीं की, लेकिन एक चार्वाक ने की और वेदों को धूर्तों, चापलूसों और राक्षसों की बकवास तक कह दिया, इसलिए चार्वाक मुनि रेखांकित हो गए और नास्तिक मान लिए गए। पर उन्हें पूरे भारत में कोई ठोस परंपरा नहीं मिली, बेशक परंपरा ने उन्हें विचारकों की श्रेणी में जगह जरूर दे दी।

वेदों की निंदा किसी ने इसलिए नहीं की क्योंकि वेद ज्ञान का स्रोत हैं, विचारों का अबाध प्रवाह हैं, प्रकृति के विभिन्न प्रत्यक्ष–परोक्ष रूपों को देवता मानकर उन पर लिखे गए मंत्रों का संग्रह हैं, अपने समय के भारतीय समाज का सम्पूर्ण शब्द–आकार है, साहित्यिक प्रतिबिंब हैं और लगातार विमर्श का विषय रहे हैं। ऐसे वेदों की निंदा करने का कोई अवसर था ही नहीं, आज भी नहीं है।

षड्दर्शन उन भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक विचारों के मंथन का परिपक्व परिणाम है जो हजारों वर्षो के चिन्तन से उतरा और हिन्दू (वैदिक) दर्शन के नाम से प्रचलित हुआ। इन्हें आस्तिक दर्शन भी कहा जाता है। दर्शन और उनके प्रणेता निम्नलिखित है।
१ पूर्व मीमांसा: महिर्ष जैमिनी
२ वेदान्त (उत्तर मीमांसा): महिर्ष बादरायण
३ सांख्य: महिर्ष कपिल
४ वैशेषिक: महिर्ष कणाद
५ न्याय: महिर्ष गौतम
६ योग: महिर्ष पतंजलि

वेद ज्ञान को समझने व समझाने के लिए दो प्रयास हुए:

१. दर्शनशास्त्र
२. ब्राह्यण और उपनिषदादि ग्रन्थ।

ब्राह्यण और उपनिषदादि ग्रन्थों में अपने-अपने विषय के आप्त ज्ञाताओं द्वारा अपने शिष्यों, श्रद्धावान व जिज्ञासु लोगों की मूल वैदिक ज्ञान सरल भाषा में विस्तार से समझाया है। यह ऐसे ही है जैसे आज के युग में आइन्सटाइन को Theory of Relatively व अन्य विषयों का आप्त ज्ञाता माना जाता है तथा उसके कथनों व लेखों को अधिकांश लोग, बगैर ज्यादा अन्य प्रमाण के सत्यच मान लेते है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी है जो कि आइन्सटाइन की इन विषयों में सिद्धहस्ता (आप्तता) पर संदेह करते है, उनको समझाने के लिए तर्क (Logic) की आवश्यकता है। इसी तरह वेद ज्ञान को तर्क से समझाने के लिए छइ दर्शन शास्त्र लिखे गये। सभी दर्शन मूल वेद ज्ञान को तर्क से सिद्ध करते है। प्रत्येक दर्शन शास्त्र का अपना-अपना विषय है। यह उसी तरह है जैसे कि भौतिक विज्ञान (Physics) में Newtonian Physics, Maganetism Atomi Physics, इत्यादि है। दर्शन शास्त्र सूत्र रूप में लिखे गये है। प्रत्येक दर्शन अपने लिखने का उद्देश्य अपने प्रथम सूत्र में ही लिख तथा अन्त में अपने उद्देश्य की पूर्ति का सूत्र देता है।
वैदिक ज्ञान की अद्वितीय पुस्तक भगवद्गीता के ज्ञान का आधार वेद, उपनिषद और दर्शन शास्त्र ही है।

भगवद्गीता २-३९ और १३-४ में कहा है कि :

एषा तेSभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रुणु।
बुद्धया युक्तो यथा पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि।।
गीता २-३९

-हे अर्जुन! यह बुध्दि(ज्ञान) जो सांख्य के अनुसार मैंने तुझे कही है, अब यही बुध्दि मैं तुझे योग के अनुसार कहू¡गा, जिसके ज्ञान से तू कर्म-बन्धन को नष्ट कर सकेगा।

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविषै: पृथक्।
ब्रह्यसूत्रपवैश्चैव हेतुमदिभर्विनिधैश्चितै:।।४।।
गीता१३-४

इस क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मतत्वों) के विषय में ऋषियों ने वेदों ने विविध भाँति से समझाया है। (इन्ही के विषय) में ब्रह्यसूत्रों में पृथक्-पृथक् (शरीर जीवात्मा और परमात्मा के विषय में) युक्तियुक्त ढंग से (तर्क से) कथन किया है।

१. पूर्व मीमांसा

मीमांसा शब्द का अर्थ (पाणिनि के अनुसार) जिज्ञासा है। जिज्ञासा अर्थात् जानने की लालसा।
अत: पूर्व-मीमांसा शब्द का अर्थ है जानने की प्रथम जिज्ञासा। इसके सोलह अध्याय हैं
मनुष्य जब इस संसार में अवतरित हुआ उसकी प्रथम जिज्ञासा यही रही थी कि वह क्या करे? अतएव इस दर्शनशास्त्र का प्रथम सूत्र मनुष्य की इस इच्छा का प्रतीक है।
दस दर्शन के प्रवर्तक महिर्ष जैमिनी है। इस ग्रन्थ में १२ अध्याय, ६० पाद और २,६३१ सूत्र है।
ग्रन्थ का आरम्भ ही महिर्ष जैमिनि इस प्रकार करते है-
अधातो धर्मजिज्ञासा।।
अब धर्म करणीय कर्म के जानने की जिज्ञासा है। इस जिज्ञासा का उत्तर देने के लिए यह पूर्ण १६ अध्याय वाला ग्रन्थ रचा गया है।
कर्म एक विस्तृत अर्थवाला शब्द है। अत: इसके विषय में १६ अध्याय और ६४ पादोंवाला ग्रन्थ लिखना उचित ही था।
यहाँ हम इस ग्रन्थ की झलक मात्र भी देने में असमर्थ हैं। केवल इतना बता देना ही पर्याप्त समझते है कि धर्म की व्याख्या यजुर्वेद में की गयी है। वेद के प्रारम्भ में ही यज्ञ की महिमा का वर्णन है। वैदिक परिपाटीमें यज्ञ का अर्थ देव-यज्ञ ही नहीं है, वरन् इसमें मनुष्य के प्रत्येक प्रकार के कायो का समावेश हो जाता है।
बढ़ई जब वृक्ष की लकड़ी से कुर्सी अथवा मेज बनाता है तो वह यज्ञ ही करता है। वृक्ष का तना जो मूल रूप में ईधन के अतिरिक्त, किसी भी उपयोगी काम का नहीं होता, उसे बढ़ई ने उपकारी रूप देकर मानव का कल्याण किया है। अत: बढ़ई का कार्य यज्ञरूप ही है।
एक अन्य उदाहरण ले सकते हैं। कच्चे लौह को लेकर योग्य वैज्ञानिक और कुशल शिल्पी एक सुन्दर कपड़ा सीने की मशीन बना देते हैं। इस कार्य से मानव का कल्याण हुआ। इस कारण यह भी यज्ञरूप है।
सभी प्रकार के कर्मों की व्याख्या इस दर्शन शास्त्र में है।
ज्ञान उपलब्धि के जिन छह साधनों की चर्चा इसमें की गई है, वे है-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि। मीमांसा दर्शन के अनुसार वेद अपौरूषेय, नित्य एवं सर्वोपरि है और वेद-प्रतिपादित अर्थ को ही धर्म कहा गया है।
मीमांसा सिद्धान्त में वक्तव्य के दो विभाग है- पहला है अपरिहार्य विधि जिसमें उत्पत्ति, विनियोग, प्रयोग और अधिकार विधियां शामिल है। दूसरा विभाग है अर्थवाद जिसमें स्तुति और व्याख्या की प्रधानता है।

२. ब्रह्यसूत्र (उत्तर मीमांसा)

जब मनुष्य जीवन-यापन करने लगता है तो उसके मन में दूसरी जिज्ञासा जो उठती है, वह है ब्रह्य -जिज्ञासा। ब्रह्यसूत्र का प्रथम सूत्र ही है-

अथातो ब्रह्यजिज्ञासा।।

ब्रह्य के जानने की लालसा।
इस जिज्ञासा का चित्रण श्वेताश्वर उपनिषद् में बहुत बहुत भली-भाँति किया गया है। उपनिषद् का प्रथम मंत्र है-

ब्रह्यवादिनो वदन्ति-
किं कारणं ब्रह्य कुत: स्म जाता जीवाम केन क्व च संप्रतिष्ठा:।
अधिष्ठिता: केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्यविदो व्यवस्थाम्।।

 

अर्थ-ब्रह्य का वर्णन करने वाले कहते है, इस (जगत्) का कारण क्या है, इस (जगत्) का कारण क्या है? हम कहाँ से उत्पन्न है? कहाँ स्थित है? (कैसे स्थित है?)यह सुख-दु:ख क्यों होता है? ब्रह्य की जिज्ञासा करने वाला यह जानने चाहते हैं। उत्पन्न हुआ कि `यह सब क्या है, क्यों हैं? इत्यादि।
पहली जिज्ञासा कर्म धर्म की जिज्ञासा थी और दूसरी जिज्ञासा जगत् का मूल कारण जानने ज्ञान की थी।
इस दूसरी जिज्ञासा का उत्तर ही ब्रह्यसूत्र अर्थात् उत्तर मीमांसा है। चूँकि यह दर्शन वेद के परम ओर अन्तिम तात्पर्य का दिग्दर्शन कराता है, इसलिए इसे वेदान्त दर्शन के नाम से ही जाना जाता हैं
वेदस्य अन्त: अन्तिमो भाग ति वेदान्त:।। यह वेद के अन्तिम ध्येय ओर कार्य क्षेत्र की शिक्षा देता है।
ब्रह्मसूत्र के प्रवर्तक महिर्ष बादरायण है। इस दर्शन में चार अध्याय, प्रत्येक अध्याय में चार-चार पाद (कुल १६ पाद) और सूत्रों की संख्या ५५५ है।
इसमें बताया गया है कि तीन ब्रह्य अर्थात् मूल पदार्थ है-प्रकृति,जीवात्मा और परमात्मा। तीनों अनादि है। इनका आदि-अन्त नहीं। तीनों ब्रह्य कहाते है और जिसमें ये तीनो विद्यमान है अर्थात् जगत् वह परम ब्रह्य है।
प्रकृति जो जगत् का उपादान कारण है, परमाणुरूप है जो त्रिट (तीन शक्तियो-सत्व, राजस् और तमस् का गुट) है। इन तीनो अनादि पदार्थों का वर्णन ब्रह्यसूत्र(उत्तर मीमांसा) में है।
जीवात्मा का वर्णन करते हुए इसके जन्म-मरण के बन्धन में आने का वर्णन भी ब्रह्यसूत्र में है। साथ ही मरण-जन्म से छुटकारा पाने का भी वर्णन है।
परमात्मा जो अपने शबत रूप में तत्वों से संयुक्त होकर भासता है, परन्तु उसका अपना शुद्ध रूप नेति-नेति शब्दों से ही व्यक्त होता है।
यह दर्शन भी वेद के कहे मन्त्रों की व्याख्या में ही है।

३. सांख्य दर्शन

संख्य सृष्टि रचना की व्याख्या एवं प्रकृति और पुरूष की पृथक-पृथक व्याख्या करता है। सांख्य सर्वाधिक पौराणिक दर्शन माना जाता है। भारतीय समाज पर इसका इतना व्यापक प्रभाव हो चुका था कि महाभारत (श्रीमद्भगवद्गीता),विभिन्न पुराणों, उपनिषदों, चरक संहिता और मनु संहिता में सांख्य के विशिष्ट उल्लेख मिलते है। इसके पारंपरिक जन्मदाता कपिल मुनि थे। सांख्य दर्शन में छह अध्याय और ४५१ सूत्र है।
प्रकृति से लेकर स्थुल-भूत पर्यन्त सारे तत्वों की संख्या की गणना किये जाने से इसे सांख्य दर्शन
कहते है। सांख्य सांख्या द्योतक है। इस शास्त्र का नाम सांख्य दर्शन इसलिए पड़ा कि इसमें २५ तत्व या सत्य-सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। सांख्य दर्शन की मान्यता है कि संसार की हर वास्तविक वस्तु का उद्गम पुरूष और प्रकृति से हुआ है। पुरूष में स्वयं आत्मा का भाव है जबकि प्रकृति पदार्थ और सृजनात्मक शक्ति की जननी है। विश्व की आत्मायें संख्यातीत है जिसमें चेतना तो है पर गुणों का अभाव है। वही प्रकृति मात्र तीन गुणो के समन्वय से बनी है। इस त्रिगुण सिद्धान्त के अनुसार सत्व, राजस्व तथा तमस की उत्पत्ति होती है। प्रकृति की अविकसित अवस्था में यह गुण निष्क्रिय होते है पर परमात्मा के तेज सृष्टि के उदय की प्रक्रिया प्रारम्भ होते ही प्रकृति के तीन गुणो के बीच का समेकित संतुलन टूट जाता है। सांख्य के अनुसार २४ मूल तत्व होते है जिसमें प्रकृति और पुरूष पच्चीसवां है। प्रकृति का स्वभाव अन्तर्वर्ती और पुरूष का अर्थ व्यक्ति-आत्मा है। विश्व की आत्माएं संख्यातीत है। ये सभी आत्मायें समान है और विकास की तटस्थ दर्शिकाएं हैं। आत्माए¡ किसी न किसी रूप में प्रकृति से संबंधित हो जाती है और उनकी मुक्ति इसी में होती है कि प्रकृति से अपने विभेद का अनुभव करे। जब आत्माओं और गुणों के बीच की भिन्नता का गहरा ज्ञान हो जाये तो इनसे मुक्ति मिलती है और मोक्ष संभव होता है।
प्रकृति मूल रूप में सत्व,रजस्,रजस् तमस की साम्यावस्था को कहते है। तीनो आवेश परस्पर एक दूसरे को नि:शेष (neutralize) कर रहे होते हैं। जैसे त्रिकंटी की तीन टांगे एक दूसरे को नि:शेष कर रही होती है।
परमात्मा का तेज परमाणु (त्रित) की साम्यावस्था को भंग करता है और असाम्यावस्था आरंभ होती है।रचना-कार्य में यह प्रथम परिवर्तन है।
इस अवस्था को महत् कहते है। यह प्रकृति का प्रथम परिणाम है। मन और बुध्दि इसी महत् से बनते हैं। इसमें परमाणु की तीन शक्तिया बर्हिमुख होने से आस-पास के परमाणुओ को आकर्षित करने लगती है। अब परमाणु के समूह बनने लगते है। तीन प्रकार के समूह देखे जाते है। एक वे है जिनसे रजस् गुण शेष रह जाता है। यह तेजस अहंकार कहलाता है। इसे वर्तमान वैज्ञानिक भाषा में इलेक्टोन कहते है।
दूसरा परमाणु-समूह वह है जिसमें सत्व गुण प्रधान होता है वह वैकारिक अहंकार कहलाता है। इसे वर्तमान वैज्ञानिक प्रोटोन कहते है।
तीसरा परमाणु-समूह वह है जिसमें तमस् गुण प्रधान होता है इसे वर्तमान विज्ञान की भाषा में न्यूटोन कहते है। यह भूतादि अहंकार है।
इन अहंकारों को वैदिक भाषा में आप: कहा जाता है। ये(अहंकार) प्रकृति का दूसरा परिणाम है।
तदनन्तर इन अहंकारों से पाँच तन्मात्राएँ (रूप, रस) रस,गंध, स्पर्श और शब्द) पाँच महाभूत बनते है अर्थात् तीनों अहंकार जब एक समूह में आते है तो वे परिमण्डल कहाते है।
और भूतादि अहंकार एक स्थान पर (न्यूयादि संख्या में) एकत्रित हो जाते है तो भारी परमाणु-समूह बीच में हो जाते है और हल्के उनके चारो ओर घूमने लगते है। इसे वर्तमान विज्ञान `ऐटम´ कहता है। दार्शनिक भाषा में इन्हें परिमण्डल कहते हैं। परिमण्डलों के समूह पाँच प्रकार के हैं। इनको महाभूत कहते हैं।
१ पार्थिव
२ जलीय
३ वायवीय
४ आग्नेय
५ आकाशीय
संख्या का प्रथम सूत्र है।
अथ त्रिविधदुख: खात्यन्त: निवृत्तिरत्यन्त पुरूषार्थ:।। १ ।।
अर्थात् अब हम तीनों प्रकार के दु:खों-आधिभौतिक (शारीरिक), आधिदैविक एवं आध्यात्मिक से स्थायी एवं निर्मूल रूप से छुटकारा पाने के लिए सर्वोकृष्ट प्रयत्न का इस ग्रन्थ में वर्णन कर रहे हैं।
सांख्य का उद्देश्य तीनो प्रकार के दु:खों की निवृत्ति करना है। तीन दु:ख है।
आधिभैतिक- यह मनुष्य को होने वाली शारीरिक दु:ख है जैसे बीमारी, अपाहिज होना इत्यादि।
आधिदैविक- यह देवी प्रकोपों द्वारा होने वाले दु:ख है जैसे बाढ़, आंधी, तूफान, भूकंप इत्यादि के प्रकोप ।
आध्यात्मिक- यह दु:ख सीधे मनुष्य की आत्मा को होते हैं जैसे कि कोई मनुष्य शारीरिक व दैविक दु:खों के होने पर भी दुखी होता है। उदाहरणार्थ-कोई अपनी संतान अपना माता-पिता के बिछुड़ने पर दु:खी होता है अथवा कोई अपने समाज की अवस्था को देखकर दु:खी होता है।

सांख्य का एक अन्य सूत्र है-

सत्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृति: प्रकृतेर्महान,
महतोSहंकारोSहंकारात् पंचतन्मात्राण्युभयमिनिन्द्रियं
तन्मात्रेभ्य: स्थूल भूतानि पुरूष इति पंचविंशतिर्गण:।।

 

अर्थात् सत्व, रजस और तमस की साम्यावस्था को प्रकृतिकहते है। साम्यावस्था भंग होने पर बनते हैं: महत् तीन अहंकार, पाँच तन्मात्राएँ, १० इन्द्रियाँ और पाँच महाभूत। पच्चीसवां गण है पुरूष।

४. वैशेषिक दर्शन

मूल पदार्थ-परमात्मा, जीवात्मा और प्रकृति का वर्णन तो ब्रह्यसूत्र में है। ये तीन पदार्थ ब्रह्य कहाते है। प्रकृति के परिणाम अर्थात् रूपान्तर दो प्रकार के हैं। महत् अहंकार, तन्मात्रा तो अव्यक्त है, इनका वर्णन सांख्य दर्शन में है। परिमण्डल पंच महाभूत तथा महाभूतों से बने चराचर जगत् के सब पदार्थ व्यक्त पदार्थ कहलाते हैं। इनका वर्णन वैशेषिक दर्शन में है।
वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महिर्ष कणाद है। चूंकि ये दर्शन परिमण्डल, पंच महाभूत और भूतों से बने सब पदार्थों का वर्णन करता है, इसलिए वैशेषिक दर्शन विज्ञान-मूलक है।

वैशेषिक दर्शन के प्रथम दो सूत्र है-
अथातो धर्म व्याख्यास्याम:।।
अब हम धर्म की व्याख्या करेंगे।
यतोSभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:।।

जिससे इहलौकिक और पारलौकिक (नि:श्रेयस) सुख की सिध्दि होती है वह धर्म है।
कणाद के वैशेषिक दर्शन की गौतम के न्याय-दर्शन से भिन्नता इस बात में है कि इसमें छब्बीस के बजाय ७ ही तत्वों को विवेचन है। जिसमें विशेष पर अधिक बल दिया गया है।
ये तत्व है-द्रव्य, गुण, कर्म, समन्वय,विशेष और अभाव।
वैसे वैशेषिक दर्शन बहुत कुछ न्याय दर्शन के समरूप है और इसका लक्ष्य जीवन में सांसारिक वासनाओं को त्याग कर सुख प्राप्त करना और ईश्वर के गंभीर ज्ञान-प्राप्ति के द्वारा अंतत: मोक्ष प्राप्त करना है। न्याय-दर्शन की तरह वैशेषिक भी प्रश्नोत्तर के रूप में ही लिखा गया है।
जगत में पदार्थों की संख्या केवल छह है। द्रव्य,गुण, कर्म, सामान्य, विशेष और समन्वय। क्योंकि इस दर्शन में विशेष पदार्थ सूक्ष्मता से निरूपण किया गया है। इसलिए इसका नाम वैशेषिक दर्शन है।
धर्म विशेष पसूताद द्रव्यगुणकर्म सामान्य विशेष समवायानां
पदार्थांना सधम्र्यवैधम्र्याभ्यिं तत्वज्ञानान्नि: श्रेयसम्।। वैशेषिक १|१|८
अर्थात् धर्म-विशेष से उत्पन्न हुए पदार्थ यथा,द्रव्य,गण, कर्म, सामान्य, विशेष और समवाय-रूप पदार्थों के सम्मिलित और विभक्त धर्मो के अघ्ययन-मनन और तत्वज्ञान से मोक्ष होता है। ये मोक्ष विश्व की अणुवीय प्रकृति तथा आत्मा से उसकी भिन्नता के अनुभव पर निर्भर कराता है।
वैशेषिक दर्शन में पदार्थों का निरूपण निम्नलिखित रूप से हुआ है:
जल: यह शीतल स्पर्श वाला पदार्थ है।
तेज: उष्ण स्पर्श वाला गुण है।
काल: सारे कायो की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश में निमित्त होता है।
आत्मा: इसकी पहचान चैतन्य-ज्ञान है।
मन: यह मनुष्य क अभ्यन्तर में सुख-दु:ख आदिके ज्ञान का साधन है।
पंचभूत: पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश
पंच इन्द्रिय: घ्राण, रसना, नेत्र, त्वचा और श्रोत्र
पंच-विषय: गंध,रस,रूप,स्पर्श तथा शब्द
बुध्दि: ये ज्ञान है और केवल आत्मा का गुण है।
नया ज्ञान
अनुभव है और पिछला स्मरण ।
संख्या: संख्या, परिमाण, पृथकता, संयोग और विभाग ये
आदि गुण: सारे गुण द्रव्यों में रहते हैं।
अनुभव: यथार्थ(प्रमा, विद्या) एवं अयथार्थ, (अविद्या)
स्मृति: पूर्व के अनुभव के संस्कारों से उत्पन्न ज्ञान
सुख: इष्ट विषय की प्राप्ति जिसका स्वभाव अनुकूल होता है। अतीत के विषयों के स्मरण एवं भविष्यतमें उनके संकल्प से सुख होता है।सुख मनुष्य का परमोद्देश्य होता है।
दु:ख: इष्ट के जाने या अनिष्ट के आने से होता है जिसकी प्रकृति प्रतिकूल होती है।
इच्छा: किसी अप्राप्त वस्तु की प्रार्थना ही इच्छ है जो फल या उपाय के हेतु होती है। धर्म, अधर्म या
अदृष्ठ: वेद-विहित कर्म जो कर्ता के हित और मोक्ष का साधन होता है, धर्म कहलाता है। अधर्म से अहित और दु:ख होता है जो प्रतिषिद्ध कर्मो से उपजता है। अदृष्ट में धर्म और अधर्म दोनों सम्मिलित रहते हैं।
वैशेषिक दर्शन के मुख्य पदार्थ
१.द्रव्य: द्रव्य गिनती में ९ है पृथिव्यापस्तेजो वायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।।(विशैषिक १।१।५) अर्थात् पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिशा, आत्मा और मन।
२. गुण: गुणों की संख्या चौबीस मानी गयी है जिनमें कुछ सामान्य ओर बाकी विशेष कहलाते हैं। जिन गुणो से द्रव्यों में विखराव न हो उन्हें सामान्य(संख्या, वेग, आदि) और जिनसे बिखराव (रूप,बुध्दि, धर्म आदि) उन्हें विशेष गुण कहते है।
३. कर्म: किसी प्रयोजन को सिद्ध करने में कर्म की आवश्यकता होती है, इसलिए द्रव्य और गुण के साथ कर्म को भी मुख्य पदार्थ कहते हैं। चेलना,फेंकना, हिलना आदि सभी कर्म । मनुष्य के कर्म पुण्य-पाप रूप होते हैं।
४. सामान्य: मनुष्यों में मनुष्यत्व, वृक्षों में वृक्षत्व जाति सामान्य है और ये बहुतों में होती है। दिशा, काल आदि में जाति नहीं होती क्योंकि ये अपने आप में अकेली है।
५. विशेष: देश काल की भिन्नता के बाद भी एक दूसरे के बीच पदार्थ जो विलक्षणता का भेद होता है
है वह उस द्रव्य में एक विशेष की उपस्थिति से होता है। उस पहचान या विलक्षण प्रतीति का एक निमित्त होता है-यथा गोमें गोत्व जाति से, शर्करा में मिठास से।
६. समभाव: जहाँ गुण व गुणी का संबंध इतना घना है कि उन्हें अलग नहीं किया जा सकता।
७. अभाव: इसे भी पदार्थ माना गया है। किसी भी वस्तु की उत्पत्ति से पूर्व उसका अभाव अथवा किसी एक वस्तु में दूसरी वस्तु के गुणों का अभाव (ये घट नहीं, पट है) आदि इसके उदाहरण है।

५. न्याय दर्शन

महिर्ष अक्षपाद गौतम द्वारा प्रणीत न्याय दर्शन एक आस्तिक दर्शन है जिसमें ईश्वर कर्म-फल प्रदाता है। इस दर्शन का मुख्य प्रतिपाद्य विषय प्रमाण है। न्याय शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त होता है परन्तु दार्शनिक साहित्य में न्याय वह साधन है जिसकी सहायता से किसी प्रतिपाद्य विषय की सिद्ध या किसी सिद्धान्त का निराकरण होता है-
नीयते प्राप्यते विविक्षितार्थ सिद्धिरनेन इति न्याय:।।
अत: न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पड़ताल के उपायों का वर्णन किया गया है।
इस ग्रन्थ में पा¡च अध्याय है तथा प्रत्येक अध्याय में दो दो आह्रिक हैं। कुल सूत्रों की संख्या ५३९ हैं।
न्यायदर्शन में अन्वेषण अर्थात् जाँच-पडद्यताल के उपायों का वर्णन किया गया है कहा है कि सत्य की खोज के लिए सोलह तत्व है। उन तत्वों के द्वारा किसी भी पदार्थ की सत्यता (वास्तविकता) का पता किया जा सकता है। ये सोलह तत्व है-
(१) प्रमाण, (२) प्रमेय, (३)संशय, (४) प्रयोजन, (५) दृष्टान्त, (६) सिद्धान्त, (७)अवयव, (८) तर्क (९) निर्णय, (१०) वाद, (११) जल्प, (१२) वितण्डा, (१३) हेत्वाभास, (१४) छल, (१५) जाति और (१६) निग्रहस्थान
इन सबका वर्णन न्याय दर्शन में है और इस प्रकार इस दर्शन शास्त्रको तर्क करने का व्याकरण कह सकते हैं। वेदार्थ जानने में तर्क का विशेष महत्व है। अत: यहदर्शन शास्त्र वेदार्थ करने में सहायक है।
दर्शनशास्त्र में कहा है-
तत्त्वज्ञानान्नि: श्रेयसाधिगम:।।
अर्थात्- इन सोलह तत्वों के ज्ञान से निश्रेयस् की प्राप्ति होती है।(सत्य की खोज में सफलता प्राप्ति होती है)।
न्याय दर्शन के चार विभाग-
१. सामान्य ज्ञान की समस्या का निराकरण
२. जगत की समस्या का निराकरण
३. जीवात्मा की मुक्ति
४. परमात्मा का ज्ञान
न्याय दर्शन में आघ्यात्मवाद की अपेक्षा तर्क एवं ज्ञान का आधिक्य हैइसमें तर्क शास्त्र का प्रवेश इसलिए कराया गया क्योंकि स्पष्ट विचार एवं तर्क-संगत प्रमाण परमानन्द की प्राप्ति के लिए आवश्यक है। न्याय दर्शन में १. सामान्य ज्ञान २. संसार की क्लिष्टता ३. जीवात्मा की मुक्ति एवं ४. परमात्मा का ज्ञान- इन चारों गंभीर उद्देश्यों को लक्ष्य बनाकर प्रमाण आदि १६ पदार्थ उनके तार्किक समाधान के माने गये है किन्तु इन सबमे प्रमाण ही मुख्य प्रतिपाद्य विषय है।
किसी विषय में यथार्थ ज्ञान पर पहुंचने और अपने या दूसरे के अयथार्थ ज्ञान की त्रुटि ज्ञात करना ही इस दर्शन का मुख्य उद्देश्य है।
दु:ख का अत्यन्तिक नाश ही मोक्ष है।
न्याय दर्शन की अन्तिम दीक्षा यही है कि केवल ईश्वरीयता ही वांछित है, ज्ञातव्य है और प्राप्य है- यह संसार नहीं।

पदार्थ और मोक्ष

मुक्ति के लिए इन समस्याओं का समाधान आवश्यक है जो १६ पदार्थों के तत्वज्ञान से होता है। इनमें प्रमाण और प्रमेय भी है। तत्वज्ञान से मिथ्या-ज्ञान का नाश होता है। राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके यही मोक्ष दिलाता है। सोलह पदार्थों का तत्व-ज्ञान निम्नलिखित क्रम से मोक्ष का हेतु बनाता है।
दु:ख-जन्म प्रवृति- दोष मिथ्यामानानाम उत्तरोत्तरापाये तदनंन्तरा पायायदपवर्ग:।।
अर्थात-दु:ख, जन्म, प्रवृति(धर्म-अधर्म),दोष (राग,द्वेष), और मिथ्या ज्ञान-इनमें से उत्तरोतर नाश द्वाराइसके पूर्व का नाश होने से अपवर्ग अर्थात् मोक्ष होता है।
इनमें से प्रमेय के तत्व-ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है और प्रमाण आदि पदार्थ उस ज्ञान के साधन है। युक्ति तर्क है जो प्रमाणों की सहायता करता है।पक्ष-प्रतिपक्ष के द्वारा जो अर्थ का निश्चय है, वही निर्णय है। दूसरे अभिप्राय से कहे शब्दों का कुछ और ही अभिप्राय कल्पना करके दूषण देना छल है।

आत्मा का अस्तित्व

आत्मा, शरीर और इन्द्रियों में केवल आत्मा ही भोगने वाला है। इच्छा,द्वेष, प्रयत्न, सुख-दु:ख और ज्ञान उसके चिह्म है जिनसे वह शरीर से अलग जाना पड़ता है। उसके भोगने का घर शरीर है। भोगने के साधन इन्द्रिय है। भोगने योग्य विषय (रूप,रस,गंध, शब्द और स्पर्श) ये अर्थ है उस भोग का अनुभव बुध्दि है और अनुभव कराने वाला अंत:करण मन है। सुख-दु:ख का कराना फल है और अत्यान्तिक रूप से उससे छूटना ही मोक्ष है।

६. योग दर्शन

योग की प्रक्रिया विश्व के बहुत से देशों में प्रचलित है। अधिकांशत: यह आसनों के रूप में जानी जाती है। कहीं-कहीं प्राणायाम भी प्रचलित है। यह आसन इत्यादि योग दर्शन का बहुत ही छोटा भाग है।
इस दर्शन की व्यवहारिक और आध्यात्मिक उपयोगिता सर्वमान्य है क्योकि योग के आसन एवं प्राणायाम का मनुष्य के शरीर एवं उसके प्राणों को बलवान एवं स्वस्थ्य बनाने में सक्षम योगदान रहा है।
इस दर्शन के प्रवर्तक महर्ष पतंजलि है। यह दर्शन चार पदों में विभक्त है जिनके सम्पूर्ण सूत्र संख्या १९४ है। ये चार पद है: समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद।
योग दर्शन के प्रथम दो सूत्र है।
अथ योगानुशासनम् ।। १ ।।
अर्थात योग की शिक्षा देना इस समस्त शास्त्र का प्रतिपाद्य विषय समझना चाहिए।
योगश्चित्तवृत्ति निरोध: ।। २ ।।
अर्थात् चित्त या मन की स्मरणात्मक शक्ति की वृत्तियों को सब बुराई से दूर कर, शुभ गुणो में स्थिर करके, पश्रमेश्वर के समीप अनुभव करते हुए मोक्ष प्राप्त करने के प्रयास को योग कहा
जाता है।
योग है जीवात्मा का सत्य के साथ संयोग अर्थात् सत्य-प्राप्ति का उपाय। यह माना जाता है कि ज्ञान की प्राप्ति मनुष्य-जीवन का लक्ष्य है और ज्ञान बुध्दि की श्रेष्ठता से प्राप्त होता है।
भगवद्गीता में कहा गया है

एवं बूद्धे: परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।

अर्थात् इस प्रकार बुध्दि से परे आत्मा को जानकर , आत्मा के द्वारा आत्मा को वश में करके (अपने पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है) यही योग है।
इसे प्राप्त करने का उपाय योगदर्शन में बताया है। आत्मा पर नियंत्रण बुध्दि द्वारा, यह योग दर्शन का विषय है। इसका प्रारिम्भक पग योगदर्शन में ही बताया है
तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग:।। योग० २-१
अर्थात्–तप(निरंतर प्रयत्न), स्वाध्याय(अध्यात्म – विद्या का अध्ययन) और परमात्मा के आश्रय से योग का कार्यक्रम हो सकता है।
अष्टांग योग: क्लेशों से मुक्ति पाने व चित्त को समहित करने के लिए योग के ८ अंगों का अभ्यास आवश्यक है। इस अभ्यास की अवधि ८ भागों में विभक्त है- १. यम, २. नियम, ३. शासन, ४. प्राणायाम, ५. प्रत्याहार, ६. धारणा, ७. ध्यान और ८. समाधि
मुख्यत: योग-क्रियाओं का लक्ष्य है बुतद्ध को विकास देना। यह कहा है कि बुध्दि के विकास का अन्तिम रूप है- ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा।।

श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात् ।।

अर्थात्-(योग से प्राप्त) बुध्दि से ऋतंभरा कहते है और इन्द्रियों से प्रत्यक्ष तथा अनुमान से होने वाला ज्ञान सामान्य बुध्दि से भिन्न विषय अर्थ वाला हो जाता है।
इसका अभिप्राय यह है कि जो ज्ञान सामान्य बुध्दि से प्राप्त होता है वह भिन्न है और ऋतंभरा (योग से सिद्ध हुई बुध्दि) से प्राप्त ज्ञान भिन्न अर्थ वाला हो जाता है।
इससे ही अध्यात्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है जिससे मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
आभार: (इस लेख के लिए काफी सामग्री श्री गुरूदत्त की पुस्तक `हमारी संस्कृति धरोहर´ से ली गई है।)

बीसवीं सदी में परंपरागत अरस्तू के तर्कशास्त्र से भिन्न प्रतीक मूलक या प्रतीकनिष्ठ तर्कशास्त्र का विकास हुआ है। कुछ परीक्षकों की द्ष्टि में यह एक बड़ी घटना है। इस नये तर्कशास्त्र को गणितनिष्ठ तर्कशास्त्र भी कहते हैं।

उन्नीसवीं सदी के मध्य में दो अंग्रेज गणिताज्ञों ने तर्कशास्त्र के इस नये रूप का आधार खड़ा किया; ये दो गणितज्ञ थे — आगस्टस डि मार्गन तथा जार्ज बूल। इनका मुख्य अन्वेषण यह था कि अरस्तू के तर्कशास्त्र में जिन अनुमितियों का उल्लेख है, उनमें कहीं अधिक कोटियों की प्रामाणिक अनुमितियाँ हैं। अरस्तू के न्याय-वाक्य (सिलाजिज्म) में प्रकट की जाने अनुमितियों का आधार सिद्धांत वर्गसमावेश का नियम हैं। वैसे अनुमान का प्रसिद्ध उदाहरण हैः सब मनुष्य मरणशील है; यहाँ सुकरात मनुष्य है; इसलिए सुकरात मरणशील है यहाँ मरणशीलता मनुष्य नाम के वर्ग का व्यापक धर्म है; वह उस वर्ग में समावेशित सुकरात का भी धर्म है।

मार्गन और बूल ने यह पता चलाया कि अनुमिति का असली आधार विशेष कोटि के संबंध होते है, वर्ग समावेश का नियम इन कई संबंधकें में से एक के अंतर्भूत है। अतः उस नियम को अनुमिति का स्वतंत्र सिद्धांत नहीं मानना चाहिए। दूसरे, ऐसी अनेक अनुमितियाँ होती हैं, जो न्यायवाक्य के रूप में प्रकट नहीं की जा सकती। उदाहरण- ‘क की अवस्था ख से अधिक है और ख की अवस्था ग से अधिक है, इसलिये क की अवस्था ग से अधिक है।’ प्रसिद्ध दार्शनिक एफ्‌० एच्‌० ब्रैडले (१८४६-१९२४) ने भी ऐसी अनुमितियों का संकेत किया है, जो अरस्तू के न्यायावाक्य में निवेशित नहीं हो सकतीं।

हमने कहा है कि नवीन विचारकों के अनुसार अनुमिति का आधार वाक्यों के बीच रहनेवाले कुछ संबंध हैं। स्वयं ‘संबंध’ की अवधारणा को परिभाषित करना कठिन है। संबंधों का वर्गीकरण कई तरह से होता है। कुछ संबंध दो पदों या पदार्थो मे बीच होते हैं, कुछ तीन के, इत्यादि। कोई पदार्थ संबंधग्रस्त है, यदि उसके बारे में कुछ कथन करते हुए किसी दूसरे पदार्थ का उल्लेख आवश्यक हो। ‘राम सीता का पति है’, ‘राजा ने अपने शत्रु को जहर दे दिया’, ‘देवदत्त ने विष्णुदत्त से दस हजार रुपए लेकर मकान खरीद लिया;’ – ये वाक्य क्रमशः द्विमूलक, त्रिमूलक एवं चतुर्मूलक संबंधों को प्रकट करते हैं। एक अन्य वर्गीकरण के अनुसार संबंध सम (सिमेट्रीकल), विषम (अनसिमेट्रिकल), एवं अ-सम-विषम (नॉन्‌-सिमेट्रीकल) तीन प्रकार के होते हैं। जो संबंध करते है; यथा – राम श्याम का भाई है; देवदत्त विष्णुदत्त का हमउम्र है या सहपाठी है; इत्यादि।

विषम संबंध राम सीता का पति है। अ-सम विषम- देवदत्त विष्णुदत्त को प्यार करता है। एक प्रकार के संबंध उत्पलवी संबंध कहलाते है; उससे भिन्न अनुत्प्लवी। ‘अवस्था में बड़ा होना’ ये सब उत्प्लवी (ट्रांजिटिव) संबंध हैं। यदि क ख से बड़ा, या लंबा या भारी है;और ख ग से तो यह सिद्ध होता है क ग से बड़ा या भारी है। अनुत्प्लवी संबंध- क ख का पिता है और ख ग का; यहाँ यह सिद्ध नहीं होता कि क ग का पिता है। जहाँ हम देखते हैं कि उत्पवी संबंध अनुमिति का हेतु बन जाता है। अरस्तु द्वारा प्रतिपादित वर्ग समावेश का सिद्धांत वस्तुत उत्प्लवी संबंध का दूसरा उदाहरण आक्षेप संबंध (इंप्लीकेशन) है। यदि वाक्य य वाक्य र को आक्षित करता है, और र वाक्य ल को, तो य, ल को आक्षिप्त करता है।

प्रतीकनिष्ठ तर्कशास्त्र की एक अन्य विशेषता यह है कि वहाँ वाक्यों और उनके संबंधों को प्रतीकों के द्वारा व्यक्त किया जाता है। अनुमिति के आधार वाक्यों के विशिष्ट संबंध है; ये संबंध वाक्यों के आकार (फॉर्म) पर निर्भर करते हैं, न कि उनके अर्थों पर। फलतः वाक्यों के अर्थों का विचार किए बिना, उनके आकारों में अनुस्यूत संबंधों को, और उनपर आधारित अनुमितियों को, प्रतीकों की भाषा में प्रकट किया जा सकता है। प्रतीकित होने पर विभिन्न संबंधों को संक्षेप में प्रकट किया जा सकता है। यह प्रक्रिया गणित की श्लाघनीय विशेषता है। गणित शास्त्र की उन्नति का एक प्रधान हेतु संख्याओं को दशमलव विधि (डेसमिल सिस्टम) से लिखने का आविष्कार था यह आविष्कार भारतवर्ष में हुआ।

अंकों को लिखने की रोमन प्रणाली में दस, पचास सौ आदि संख्याओं के लिए अलग अलग संकेतचिन्ह है; इसके विपरीत प्रचलित दशमलव प्रणाली में अंकविशेष का मूल्य उसकी स्थिति के अनुसार होता है, और सिफ नौ अंकों तथा शून्य-चिह्न, की मदद से किसी भी संख्या को प्रकट किया जा सकता है। प्रतीकनिष्ठ तर्कशास्त्र में वर्गों, वाक्यों आदि को प्रतीकों में प्रकट करके उनसे संबद्ध अनुमितियों के नियम प्रतिपादित किए गए हैं। वर्गकलन (कैलकुलस्‌ आफ्‌ क्लासेज) में वर्गों के पारस्परिक संबंधों, विरोध आदि के नियम बतलाए गए हैं। इसी प्रकार वाक्यसंबंधों, विरोध आदि के नियम बतलाए गए हैं। इसी प्रकार वाक्यकलन (कैलकुलस ऑव प्रापोजीशंस) में वाक्यसंबंधों के नियामक सिद्धातों या नियमों का उल्लेख रहता है। अरस्तू के न्यायवाक्य में सन्निहित सिद्धांत उक्त नियमों में से ही एक है। इससे प्रकट है कि प्रतीकनिष्ठ तर्कशास्त्र का अनुमितिक्षेत्र अरस्तू के तर्कशास्त्र की अपेक्षा कहीं अधिक विस्तृत है|

जान स्टुअर्ट मिल के मत में तर्कशास्त्र का विषय अनुमिमियाँ हैं, न कि अनुभवगम्य सत्य। तर्कशास्त्र विश्वासों का विज्ञान नहीं है, वह उपपत्ति (प्रूफ) अथवा साक्ष्य (एवीडेंस) का विज्ञान नहीं है। तर्कशास्त्र का क्षेत्र हमारे ज्ञान का वह अंश है, जिसका रूप ‘पूर्वज्ञात सत्यों से अनुमित’ होता है। तर्कशास्त्र का कार्य किसी सत्य का साक्ष्य जुटाना नहीं है, वह यह आँकने का प्रयत्न है कि किसी अनुमिति के लिये उचित साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है या नहीं। संक्षेप में तर्कशास्त्र का काम सही अनुमिति के आधारों की खोज है।

तर्कशास्त्र का ज्ञान हममें यह देखने और आँकने की क्षमता उत्पन्न करता है कि किसी सत्य का साक्ष्य जुटाना नहीं है, वह यह आँकने का प्रयत्न है कि किसी अनुमिति के निश्चयात्मक आधारों का ज्ञापन ही है, अर्थात्‌ उसका विषय निश्चयात्मक अनुमितियों और आधारभूत साक्ष्य के संबंधों को स्पष्ट करना अथवा उन नियमों को प्रकाश में लाना है जो सही अनुमान प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। इसलिए कभी कभी कहा जाता है कि तर्कशास्त्र एक नियामक (नारमेटिव, आदर्शक, आदर्शान्वेषी) विज्ञान या शास्त्र है, जिसका कार्य अनुमिति या तर्क के आदर्श रूपों को स्थिर करना है। इसके विपरीत भौतिकी या भौतिकशास्त्र, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र आदि यथार्थानवेषी (पाजिटिव) विज्ञान है, जो वस्तुसत्ता के यथार्थ या वास्तविक रूपों या नियमों का अन्वेष्ण करते हैं।

विज्ञानों का यह वर्गीकरण कुछ हद तक भ्रामक है। तर्कशास्त्र या आचारशास्त्र (नीतिशास्त्र) नियामक शास्त्र है, इस कथन का यह अर्थ लगाया जा सकता है कि उक्त शास्त्र कृत्रिम ढंग से क्षेत्रविशेष में मानव व्यवहार के नियमों का निर्देश करते हैं। मानो सही चिंतन एवं सही नैतिक व्यवहार के नियम मानव प्रकृति के निजी नियम न होकर उसपर बाहर से लादे जानेवाले नियम हैं। किंतु बात ऐसी नहीं है। वस्तुतः तर्कशास्त्र उन नियमों को, जो सही चिंतन प्रकारों में स्वतः, स्वभावतः ओतप्रोत समझे जाते हैं, प्रकट रूप में निर्देशित करने का उपकरण मात्र है। विचारशील मनुष्य स्वतः, स्वभावतः सही और गलत चिंतन में, निर्दोष एवं सदोष तर्कना- प्रकारों में अंतर करते हैं। किंतु इस प्रकार का अंतर करते हुए वे किन्हीं नियामक आदर्शों या कानूनों की अवगति या चेतना का परिचय नहीं देते। सही समझे जानेवाले तर्कना प्रकारों का विश्लेषण करके उनमें अनुस्यूत नियमों को सचेत जानकारी के धरातल पर लाना, यही तर्कशास्त्र का काम है। इसी प्रकार आचारशास्त्र भी हमें उन नियमों या आदर्शो की जानकारी देता है, जो हमारे भले बुरे के निर्णयों में, अनजाने रूप में, परिव्याप्त रहते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि विशिष्ट आचार पद्धति, अथवा किसी समाज की आचारसंहिता तथा नैतिक शिक्षा, उस समाज के नैतिक पक्षपातों को प्रकाशित करती है। इसी अर्थ में देशविशेष, कालविशेष अथवा समाजविशेष के नैतिक विचारक अपने देश, युग अथवा समाज के प्रतिनिधि चिंतक होते हैं।

तर्कशास्त्र के संबंध में उक्त मान्यता से एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष अनुगत होता है। यदि किन्हीं कारणों से मनुष्य की चिंतनप्रणाली अथवा तर्कप्रणाली में परिवर्तन या विकास हो, तो उसके अनुरूप तर्कशास्त्रीय मंतव्यों में भी परिवर्तन या विकास हो सकता है। तर्कशास्त्र के इतिहास में ऐसा भी होता है कि कालांतर में चिंतन के पुराने मानदंडों या नियमों में संशोधन आवश्यक हो जाता है; नए चिंतनप्रकारों की सृष्टि के साथ साथ नवीन तर्कशास्त्रीय नियमों का निरूपण भी अपेक्षित हो सकता है। यूरोप में जब भौतिक विज्ञान की प्रगति शुरू हुई, तो वहाँ क्रमशः अरस्तू की निगमनप्रणाली की आलोचना और उससे भिन्न आगमनप्रणाली की परिकल्पना और प्रशंसा भी होने लगी। यूरोपीय वैचारिक इतिहास में इस कोटि का कार्य लार्ड बेकन ने किया। बाद में, वैज्ञानिक अन्वेषण प्रणाली का अधिक विश्लेषण हो चुकने पर, यूरोप के तर्कशास्त्र्िायों ने निगमनमूलक विचारपद्धति (डिडक्टिव सिस्टम) एवं परिकल्पना निगमनप्रणाली (हाइपोथेटिकल डिडक्टिव मेथड) जैसी अवधारणाओं का विकास किया। आगमनात्मक तर्कशास्त्र (इंडक्टिव लॉजिक) में उन नियमों का विचार किया जाता है, जो निरीक्षित घटनाओं या व्यापारों के आधार पर तत्संबंधी सामान्य कथनो की उपलब्धि या निरूपण संभव बनाते हैं। सामान्य कथन प्रायः व्याप्ति वाक्यों का रूप धारण कर लेते हैं। भारतीय प्रमाणशास्त्र में इस प्रशन को लेकर कि व्याप्ति वाक्य की उपलब्धि कैसे होती है, काफी छानबीन की गई है। ‘जहाँ’ जहाँ धूम होता है, वहाँ अग्नि होती है यह व्याप्ति वाक्य है। स्पष्ट ही हमारे निरीक्षण में धूम और अग्नि के साहचर्य के कुछ ही उदाहरण आते हैं। प्रश्न है, कुछ स्थितियों में निरीक्षित दो चीजों के साहचर्य से हम उनके सार्वदेशिक और सार्वकालिक साहचर्य की कल्पना के औचित्य को कैसे सिद्ध कर सकते है?
इस समस्या को तर्कशास्त्र में आगमनात्मक प्लुति (इंडक्टिव लीप) की समस्या कहते हैं। परिकल्पना निगमनप्रणाली इस उलझन में पड़े बिना सामान्य कथनों अथवा व्याप्ति वाक्यों की प्रामाणिक प्रकल्पना के प्रश्न का समाधान प्रस्तुत कर देती है। संक्षेप में आधुनिक वैज्ञानिक अन्वेषण की प्रणाली यह हैः निरीक्षित घटनासहतियों से प्रेरणा लेकर वैज्ञानिक अन्वेषक नियमसूत्रों की परिकल्पना करता है; इसके बाद वह उन परिकल्पनाओं से कुछ ऐसे निष्कर्ष निकालता है, जिनका प्रयागों द्वारा परीक्षण हो सके। जहाँ तक किसी परिकल्पना के निष्कर्ष प्रयोगविधि से समर्थन पाते हैं, वहाँ तक यह समझा जाता है कि वह परिकल्पना परीक्षा में सफल हुई। परिकल्पना में निहित सामान्य नियम अंततः अन्वेषक की स्वच्छंद कल्पना की सृष्टि होता है, ऐसा प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइन्स्टाइन का मत है। प्रकृति के नियम आगमन प्रणाली से अन्वेषित होते हैं, यह मान्यता बहुत हद तक भ्रामक है। कहना यह चाहिए कि अनुभव सामग्री यानी अनुभूत घटनासंहतियाँ, प्रशिक्षित वैज्ञानिक को उपयुक्त परिकल्पनाओं या संभाव्य प्राकृतिक नियमों के न्यूनाधिक शक्तिवाले संकेत भर देती हैं।

ऊपर हमने इस बात पर बल दिया कि नई तर्कप्रणालियों के विकास के साथ साथ तर्कशास्त्रीय सिद्धांतों के स्वरूप में भी न्यूनाधिक परिवर्तन होता है। इस द्ष्टि से तर्कशास्त्र एक गतिशील विद्या है; वह स्थिर, शाश्वत नियमों का संकलन या उल्लेख मात्र नहीं हैं। वस्तुतः विभिन्न भौतिक, जैव एवं समाजशास्त्रीय विज्ञों के विकास ने तर्कशास्त्र को बहुत प्रभावित किया है। अनुमान और तर्कना की प्रणालियों तथा नियमों से अधिक आज विभिन्न विद्याओं की अन्वेष्ण प्रक्रिया अनुशीलन का विशिष्ट विषय बन गई है। उक्त प्रक्रिया की शास्त्रीय जाँच को रीतिमीमांसा (मेथडॉलॉजी) कहते हैं।

यहाँ एक ज्यादा महत्व का स्पष्टीकरण अपेक्षित है। अनुभव एवं चिंतन के विभिन्न क्षेत्रों में हमारी तर्कनाप्रक्रिया एक ही कोटि की नहीं होती। विज्ञान और गणित में तर्कना के तरीके एक प्रकार के हैं। साहित्यसमीक्षा अथवा नैतिक निर्णयों के क्षेत्र में भी ये तरीके काफी भिन्न हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते है कि कला समीक्षा, साहित्य मीमांसा, नीतिशास्त्र आदि के क्षेत्रो में परीक्षकों के स्वमतस्थापन एवं परमतखंडन की प्रणलियाँ एक ही सी नहीं होतीं। वे काफी भिन्न भी हो सकती हैं और होती हैं। इस स्थिति को निम्नांकित शब्दों में भी प्रकट किया जाता हैः गुणत्मक दृष्टि से भिन्न प्रत्येक कोटि के विषय-विवेचन (डिस्कोर्स)के नियामक मानदंड अथवा नियम बहुत कुछ अलग होते है; अर्थात चिंतन और विवेचन के प्रत्येक क्षेत्र का तर्कनाशास्त्र एक निराली कोटि का होता है। इससे अनुगत होता है कि सब प्रकार के चिंतनविवेचन का नियामक कोई एक तर्कशास्त्र नहीं है।

Blog Stats

  • 62,696 hits

प्रत्याख्यान

यह एक अव्यवसायिक वेबपत्र है जिसका उद्देश्य केवल सिविल सेवा तथा राज्य लोकसेवा की परीक्षाओं मे दर्शनशास्त्र का विकल्प लेने वाले प्रतिभागियों का सहयोग करना है। यदि इस वेबपत्र में प्रकाशित किसी भी सामग्री से आपत्ति हो तो इस ई-मेल पते पर सम्पर्क करें-

mitwa1980@gmail.com

आपत्तिजनक सामग्री को वेबपत्र से हटा दिया जायेगा। इस वेबपत्र की किसी भी सामग्री का प्रयोग केवल अव्यवसायिक रूप से किया जा सकता है।

संपादक- मिथिलेश वामनकर

अगस्त 2016
सोम मंगल बुध गुरु शुक्र शनि रवि
« मार्च    
1234567
891011121314
15161718192021
22232425262728
293031  
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.